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रामकाज और सामाजिक समरसता को समर्पित रहा महंत अवेद्यनाथ का जीवन
@आशुतोष मिश्र, चाय पंचायत
गोरखपुर। गोरक्षपीठ के युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में आयोजित साप्ताहिक श्रद्धांजलि समारोह का समापन बुधवार, 30 सितंबर को होगा। आश्विन कृष्ण चतुर्थी के अवसर पर गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पूज्य गुरुदेव महंत अवेद्यनाथ को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।
गोरखनाथ मंदिर के महंत दिग्विजयनाथ स्मृति सभागार में होने वाली श्रद्धांजलि सभा में देशभर के प्रमुख साधु-संत और धर्माचार्य शामिल होंगे। महंत अवेद्यनाथ का जीवन रामकाज, सामाजिक समरसता और लोककल्याण के लिए समर्पित रहा। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन के प्रमुख संत नेताओं में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
श्रीराम मंदिर आंदोलन को दिया व्यापक स्वरूप
महंत अवेद्यनाथ ने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण को अपने जीवन के प्रमुख मिशन के रूप में आगे बढ़ाया। महंत दिग्विजयनाथ के बाद उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की कमान संभाली। नब्बे के दशक में उनके नेतृत्व में आंदोलन को व्यापक स्वरूप मिला और यह गांव-गांव तक पहुंचा।
21 जुलाई 1984 को अयोध्या के वाल्मीकि भवन में श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ। महंत अवेद्यनाथ को सर्वसम्मति से इसका अध्यक्ष चुना गया। वह जीवनभर समिति के अध्यक्ष रहे। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति और श्रीराम जन्मभूमि निर्माण उच्चाधिकार समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संतों, धर्माचार्यों, राजनीतिज्ञों और आमजन को आंदोलन से जोड़ने में भूमिका निभाई।
सामाजिक समरसता को बनाया जीवन का ध्येय
महंत अवेद्यनाथ ने हिंदू समाज में छुआछूत और ऊंच-नीच के भेदभाव के विरुद्ध लगातार अभियान चलाया। उन्होंने दलित और वंचित बस्तियों में सहभोज की परंपरा को आगे बढ़ाया। काशी में डोमराजा के घर संतों और साधु समाज के साथ भोजन कर उन्होंने सामाजिक समरसता का संदेश दिया।
दक्षिण भारत के मीनाक्षीपुरम में दलित समाज के सामूहिक धर्मांतरण की घटना के बाद उन्होंने हिंदू समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों और जातिगत विभाजन को दूर करने पर विशेष जोर दिया। अखिल भारतवर्षीय अवधूत भेष बारहपंथ योगी महासभा के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने देशभर के संतों को भी सामाजिक समरसता के अभियान से जोड़ा।
श्रीराम और मां दुर्गा के उदाहरण से देते थे एकता का संदेश
नाथपंथ और गोरक्षपीठ के अध्येता तथा महंत अवेद्यनाथ के जीवन के शोधार्थी डॉ. प्रदीप कुमार राव के अनुसार, महंत अवेद्यनाथ सामाजिक समरसता का संदेश सरल उदाहरणों के माध्यम से देते थे। वह प्रभु श्रीराम के शबरी के बेर खाने, निषादराज को गले लगाने और गिद्धराज जटायु का अंतिम संस्कार करने जैसे प्रसंगों का उल्लेख करते थे।
इसी तरह मां दुर्गा की आठ भुजाओं का उदाहरण देकर वह समाज के विभिन्न वर्गों की एकजुटता को सामूहिक शक्ति का प्रतीक बताते थे।
महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद को दिया विस्तार
महंत अवेद्यनाथ ने शिक्षा के क्षेत्र में भी अपने गुरुदेव महंत दिग्विजयनाथ की परंपरा को आगे बढ़ाया। उनके नेतृत्व में महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद का विस्तार हुआ। परिषद के अंतर्गत प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा, चिकित्सा, तकनीकी और सेवा क्षेत्र से जुड़े संस्थान संचालित हो रहे हैं।
राजनीति में भी रहा लंबा सफर
महंत अवेद्यनाथ ने राजनीति में भी लंबी पारी खेली। उन्होंने 1962, 1967, 1969, 1974 और 1977 में मानीराम विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद 1970, 1989, 1991 और 1996 में गोरखपुर सदर लोकसभा क्षेत्र से सांसद रहे।
वह अखिल भारतीय हिंदू महासभा के उपाध्यक्ष और महासचिव भी रहे। राजनीतिक जीवन में राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, भारतीय संस्कृति, शैक्षिक पुनर्जागरण और हिंदू समाज की एकता से जुड़े मुद्दे उनके प्रमुख विषय रहे।
18 मई 1919 को उत्तराखंड के गढ़वाल स्थित ग्राम कांडी में जन्मे महंत अवेद्यनाथ का बचपन से ही धर्म और अध्यात्म की ओर झुकाव था। गोरक्षपीठ में उन्हें महंत दिग्विजयनाथ का सानिध्य मिला। आठ फरवरी 1942 को उन्होंने गोरक्षपीठ में विधिवत दीक्षा ली। वर्ष 1969 में महंत दिग्विजयनाथ की चिरसमाधि के बाद 29 सितंबर को वह गोरखनाथ मंदिर के महंत और पीठाधीश्वर बने। वर्ष 2014 में आश्विन कृष्ण चतुर्थी को उन्होंने चिरसमाधि ली।
12वीं पुण्यतिथि पर होने वाली श्रद्धांजलि सभा में महंत अवेद्यनाथ के धार्मिक, सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक योगदान को स्मरण किया जाएगा।
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