आखिरी सांस के बाद भी जारी रहेगी सेवा, रामेश्वर की आंखों से दो जिंदगियों में आएगा उजाला

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गोरखपुर। किसी इंसान की जिंदगी की असली कीमत इस बात से नहीं तय होती कि उसने कितने वर्ष जिए, बल्कि इस बात से तय होती है कि उसके होने से कितनी जिंदगियों में फर्क पड़ा। रामेश्वर दत्त मिश्र ने 84 वर्षों में देश की सेवा की, समाज की जिम्मेदारी निभाई और लोगों के उपचार में अपना जीवन लगाया। अब जब वह इस दुनिया में नहीं हैं, तब भी उनकी सेवा यात्रा थमी नहीं है। उनकी आंखें किसी दो दृष्टिबाधित लोगों के जीवन में रोशनी की वजह बनेंगी।
शुक्रवार को गोरखनाथ क्षेत्र स्थित एक चिकित्सालय में उपचार के दौरान हृदयाघात से उनका निधन हो गया। खबर घर पहुंची तो माहौल गमगीन हो गया। पिता के जाने का दुख बेटे आशुतोष मिश्र और परिवार के लिए शब्दों से परे था। लेकिन इसी दुख की घड़ी में पिता की वर्षों पुरानी इच्छा सामने आई—उनके जाने के बाद उनकी आंखें किसी जरूरतमंद के काम आएं।
बेटे आशुतोष मिश्र ने पिता की इच्छा को अंतिम कर्तव्य माना। रोटरी क्लब गोरखपुर की पहल पर बीआरडी मेडिकल कालेज की टीम उनके घर पहुंची। करीब 45 मिनट में नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी हुई और दोनों आंखें सुरक्षित कर ली गईं। चिकित्सकों के अनुसार इनके प्रत्यारोपण से दो लोगों के जीवन में दृष्टि लौटने की संभावना है।

स्व. रामेश्वर दत्त मिश्र

पिता ने जो कहा, बेटे ने वही कर दिखाया
आशुतोष मिश्र बताते हैं कि पिता अक्सर कहते थे—शरीर मृत्यु के बाद नष्ट हो जाता है, लेकिन अगर उसके जरूरी अंग किसी के जीवन को आगे बढ़ा सकते हैं तो उन्हें दान कर देना चाहिए। यह बात उनके लिए महज विचार नहीं थी। उन्होंने अपने जीवन में दूसरों की मदद को महत्व दिया और मृत्यु के बाद भी उसी भावना को कायम रखना चाहा।
पिता की अंतिम इच्छा पूरी करते हुए आशुतोष ने यह साबित किया कि नेत्रदान केवल किसी व्यक्ति का निर्णय नहीं, बल्कि पूरे परिवार की संवेदनशीलता और साहस का परिचायक है।
भारतीय वायुसेना में सेवाकाल के दौरान रामेश्वर दत्त मिश्र ने अनुशासन और राष्ट्रसेवा को जीवन का आधार बनाया। सेवानिवृत्ति के बाद भी वह समाज से दूर नहीं हुए। नागरिक सुरक्षा कोर में डिवीजनल वार्डन की भूमिका निभाई और सामाजिक जिम्मेदारियों में सक्रिय रहे।
बाद में वैद्य के रूप में भी लोगों की सेवा करते रहे। जिंदगी के अलग-अलग पड़ावों पर उनका परिचय बदलता रहा—वायुसेना से नागरिक सुरक्षा कर्मी और फिर वैद्य तक। लेकिन एक चीज कभी नहीं बदली—दूसरों के लिए कुछ करने की इच्छा।
एक दिन कोई उनकी आंखों से दुनिया देखेगा
शनिवार को वाराणसी में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। पुत्र आशुतोष मिश्र मुखाग्नि देंगे। यह परिवार के लिए अंतिम विदाई होगी, मगर रामेश्वर दत्त मिश्र की कहानी यहीं समाप्त नहीं होगी।
किसी दिन किसी अस्पताल में दो लोग आंखें खोलेंगे। उनके सामने धुंधला संसार साफ होगा। वे अपने परिवार को देखेंगे, अपने घर को पहचानेंगे, आसमान को निहारेंगे। उन्हें शायद कभी पता भी न चले कि उनकी आंखों में रोशनी किसकी वजह से आई है।
लेकिन उस रोशनी के पीछे एक ऐसे इंसान की अंतिम इच्छा होगी, जिसने अपने जाने के बाद भी किसी अनजान व्यक्ति के लिए कुछ बचाकर रखा।
रोटरी क्लब के पूर्व अध्यक्ष महावीर कंडोई, अध्यक्ष प्रवीर आर्य, पूर्व सचिव आलोक अग्रवाल, रामपाल सिंह, अखिलेश ओझा, मांधाता सिंह, अनिल वलानी व श्रीलाल मांझानी सहित अन्य ने श्रद्धांजलि दी।

प्रस्तुति : राम प्रताप विश्वकर्मा – चाय पंचायत

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