Gorakhpur Terracotta: गोरखपुर की माटी अब वैश्विक बाजार में, यूपीआईटीएस में लगेंगे चार स्टॉल

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25 से 29 सितंबर तक ग्रेटर नोएडा में जुटेंगे देश-विदेश के खरीदार और कारोबारी; ओडीओपी में शामिल होने के बाद बदली टेराकोटा शिल्पियों की तस्वीर

@आशुतोष मिश्र, चाय पंचायत

गोरखपुर। जिस मिट्टी को कभी साधारण समझकर छोड़ दिया जाता था, उसी से गोरखपुर के शिल्पियों ने ऐसी कलाकृतियां गढ़ी हैं, जिनकी पहचान अब देश की सीमाओं से आगे बढ़ रही है। गोरखपुर का प्रसिद्ध टेराकोटा शिल्प एक बार फिर वैश्विक बाजार में अपनी पहचान मजबूत करने जा रहा है। ग्रेटर नोएडा स्थित इंडिया एक्सपो सेंटर एंड मार्ट में 25 से 29 सितंबर तक होने वाले उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो (यूपीआईटीएस) 2026 में गोरखपुर के टेराकोटा उत्पादों के चार स्टॉल लगाए जाएंगे।

अंतरराष्ट्रीय स्तर के इस व्यापार मेले में गोरखपुर के शिल्पियों को विदेशी प्रतिनिधियों, खरीदारों, निर्यातकों और बड़े कारोबारी समूहों के सामने अपने उत्पाद सीधे प्रदर्शित करने का अवसर मिलेगा। इससे टेराकोटा उत्पादों के लिए नए बाजार खुलने और निर्यात कारोबार को विस्तार मिलने की संभावनाएं बनेंगी।

चार स्टॉल पर दिखेगी गोरखपुर की माटी की कारीगरी

उद्योग विभाग ने यूपीआईटीएस के लिए चार शिल्पियों और कारोबारियों का चयन किया है। इनमें मेसर्स अतरंगी कलाकारी की दीपिका सिंह, रीतिका कृतिका क्रिएशन की सुनीता मौर्या, गिफ्ट सिटी के कमलेश तिवारी और मेसर्स रोशनी एक उम्मीद ट्रस्ट की कोमल मद्देशिया शामिल हैं।

दीपिका सिंह टेराकोटा के आभूषण और गृह सज्जा उत्पाद तैयार करती हैं। मेले में पारंपरिक टेराकोटा कला के साथ आधुनिक डिजाइन वाले उत्पाद भी प्रदर्शित किए जाएंगे। इससे गोरखपुर के टेराकोटा को बदलती बाजार जरूरतों के अनुरूप पेश करने का अवसर मिलेगा।

ओडीओपी ने मिट्टी के हुनर को दिया बाजार

भटहट ब्लाक का औरंगाबाद गांव गोरखपुर के टेराकोटा शिल्प का प्रमुख केंद्र माना जाता है। आसपास के गांवों में पीढ़ियों से मिट्टी को आकार देकर सजावटी और उपयोगी उत्पाद तैयार किए जाते रहे हैं। वर्ष 2018 में टेराकोटा को एक जिला एक उत्पाद (ओडीओपी) में शामिल किए जाने के बाद इस पारंपरिक शिल्प को सरकारी स्तर पर नई पहचान मिली।

शिल्पियों को विद्युत चालित चाक, पगमिल और अनुदान आधारित ऋण जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। साथ ही विभिन्न मंचों पर टेराकोटा की ब्रांडिंग से बाजार का दायरा बढ़ा। मांग बढ़ने के साथ उत्पादन और कारोबार में भी विस्तार हुआ।

झोपड़ी से पक्के वर्कशॉप तक पहुंची शिल्पकारों की जिंदगी

टेराकोटा की बढ़ती मांग का असर शिल्पकारों के जीवन पर भी पड़ा है। कभी कच्ची झोपड़ियों में मिट्टी को आकार देने वाले कई शिल्पियों ने अब पक्के वर्कशॉप और मकान बनाए हैं। कारोबार बढ़ने से आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ इस पारंपरिक कला को सामाजिक पहचान भी मिली है।

सबसे बड़ा बदलाव नई पीढ़ी की भागीदारी में दिखाई दे रहा है। आधुनिक डिजाइन और बाजार की जरूरतों को समझने वाले युवा अब पुश्तैनी कारोबार से जुड़ रहे हैं। टेराकोटा के पारंपरिक स्वरूप में नए प्रयोग कर उत्पादों को बाजार के अनुरूप तैयार किया जा रहा है।

अब लक्ष्य स्थानीय बाजार से आगे निर्यात तक

उद्योग उपायुक्त उज्ज्वल सिंह के अनुसार, यूपीआईटीएस में टेराकोटा के स्टॉल गोरखपुर के शिल्पियों की मेहनत और हुनर को अंतरराष्ट्रीय मंच देंगे। पारंपरिक शिल्प को तकनीक, बाजार और नीतिगत सहयोग मिलने से कारोबार को नई दिशा मिली है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में होने वाले कारोबारी संपर्क टेराकोटा के निर्यात के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

 

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