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किक बॉक्सिंग में स्वर्ण जीतकर बढ़ाया मान, अब प्रयागराज में ओलंपिक की तैयारी
बेटी के सपने के लिए मां ने बेच दिए जेवर, पिता बोले—आर्थिक तंगी नहीं बनने देंगे बाधा
रिपोर्ट : राम प्रताप विश्वकर्मा
गोरखपुर। मां के जेवर बिक गए, लेकिन बेटी के सपने की चमक कम नहीं हुई। घर की आर्थिक परिस्थितियां सीमित हैं, खेल का खर्च लगातार बढ़ रहा है, फिर भी मानसी निषाद की आंखों में एक बड़ा सपना पल रहा है—ओलंपिक में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतना। इस सपने को पूरा करने के लिए वह प्रयागराज में रहकर प्रशिक्षण ले रही हैं और पीछे परिवार अपनी सामर्थ्य से हर संभव सहारा दे रहा है।

मानसी की कहानी केवल एक खिलाड़ी के पदक जीतने की कहानी नहीं, बल्कि उस जिद की कहानी है, जो अभावों के बीच भी मंजिल का रास्ता तलाश लेती है। चौरीचौरा विधानसभा क्षेत्र के ग्राम भैसहा बाढ़न की रहने वाली मानसी वर्तमान में गोरखपुर के रामपुर वार्ड नंबर-39, भगत चौराहा में परिवार के साथ रहती हैं। छोटी-सी शुरुआत से खेल के मैदान तक पहुंची मानसी ने अब बड़े सपने देखने शुरू कर दिए हैं।
जब बेटी का सपना सबसे बड़ा हो गया
मानसी के खेल में आगे बढ़ने के साथ प्रशिक्षण, प्रतियोगिताओं और यात्रा का खर्च भी बढ़ता गया। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि हर जरूरत आसानी से पूरी हो सके। लेकिन बेटी की प्रतिभा और लगन देखकर मां-पिता ने कभी उसे रोकने के बारे में नहीं सोचा। जरूरत पड़ी तो मां ने अपने जेवर तक बेच दिए।
परिवार के लिए यह केवल आर्थिक त्याग नहीं था। यह उस विश्वास की कीमत थी, जो माता-पिता को अपनी बेटी की प्रतिभा पर है।
पिता गंगा निषाद कहते हैं, “बेटी के खेल और उसके सपने के बीच आर्थिक संकट को आड़े नहीं आने देंगे। जितना संभव होगा, हम उसके लिए करेंगे।”
गांव में घर और खेती से जुड़ा परिवार अपनी सीमित आमदनी में बेटी के सपने को सींच रहा है। पिता को भरोसा है कि मेहनत रंग लाएगी और एक दिन मानसी देश का नाम रोशन करेगी।
दौड़ के ट्रैक से किक बॉक्सिंग के रिंग तक
मानसी की प्रतिभा केवल किक बॉक्सिंग तक सीमित नहीं है। वह दौड़ प्रतियोगिताओं में भी कई पदक जीत चुकी हैं। खेल के प्रति उनका जुनून उन्हें एक विधा से दूसरी विधा तक ले गया और किक बॉक्सिंग में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनानी शुरू कर दी।
23 मई को आगरा में आयोजित किक बॉक्सिंग प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर मानसी ने अपनी क्षमता का परिचय दिया। इस जीत ने उनके आत्मविश्वास को और मजबूत किया और अब उनकी नजर राष्ट्रीय स्तर से आगे अंतरराष्ट्रीय मंच पर है।
प्रयागराज में पसीने से लिख रही हैं भविष्य
ओलंपिक में स्वर्ण जीतने के लक्ष्य के साथ मानसी इन दिनों प्रयागराज में प्रशिक्षण ले रही हैं। रिंग में अभ्यास के दौरान बहता पसीना उनके लिए केवल मेहनत नहीं, बल्कि उस सपने की कीमत है जिसे उन्होंने अपनी आंखों में संजोया है।
हर अभ्यास सत्र के साथ वह खुद को पहले से बेहतर बनाने की कोशिश कर रही हैं। उन्हें पता है कि ओलंपिक तक पहुंचने का रास्ता लंबा है और वहां पदक जीतना उससे भी कठिन। लेकिन मुश्किलों से जूझना मानसी ने सीख लिया है।
पिता को बेटी पर नाज
गंगा निषाद कहते हैं कि उन्हें अपनी बेटी पर गर्व है। उनके अनुसार, बेटियों को खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने से रोकने के बजाय उन्हें अवसर देना चाहिए। “मेहनत और लगन के साथ आगे बढ़ने पर सफलता जरूर मिलती है। हमारी बेटी ने जो हासिल किया है, उससे पूरा परिवार खुश है,” उनका कहना है।
मानसी अकेली नहीं, हजारों बेटियों की उम्मीद हैं
मानसी की कहानी उस भारत की तस्वीर भी दिखाती है, जहां गांव-कस्बों की प्रतिभाशाली बेटियां संसाधनों की कमी के बावजूद बड़े सपने देख रही हैं। कई बार प्रतिभा की कमी नहीं होती, कमी होती है तो केवल प्रशिक्षण, उपकरण, यात्रा और प्रतियोगिताओं के लिए जरूरी आर्थिक सहयोग की।
मानसी के पास प्रतिभा है, मेहनत है और परिवार का मजबूत साथ भी। अब जरूरत है कि समाज, सरकार और खेल संस्थाएं ऐसी प्रतिभाओं की ओर भी नजर करें। क्योंकि किसी खिलाड़ी का सपना केवल उसका निजी सपना नहीं होता, वह देश के लिए पदक की संभावित उम्मीद भी होता है।
मानसी की मां के बिके जेवर और पिता का संकल्प इस बात की गवाही दे रहे हैं कि सपनों की कीमत चाहे जितनी बड़ी हो, हौसला उससे बड़ा हो तो मंजिल दूर नहीं रहती। अब मानसी की निगाह उस मंच पर है, जहां तिरंगा सबसे ऊंचा उठे और उसके गले में ओलंपिक स्वर्ण पदक हो।

