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गोरखपुर के बुढ़िया माता मंदिर, तरकुलहा देवी मंदिर, गोलघर काली मंदिर और जंगल कौड़िया के देवी धाम में नवरात्र पर विशेष पूजा-अर्चना; महराजगंज का लेहड़ा देवी मंदिर भी आस्था का बड़ा केंद्र
@आशुतोष मिश्र, चाय पंचायत।
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गोरखपुर। शारदीय नवरात्र में गोरखपुर और आसपास का क्षेत्र देवी आराधना में डूब जाता है। शहर से लेकर गांव और जंगल तक स्थित गोरखपुर के प्रमुख देवी मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की कतार लगने लगती है। कहीं घने जंगल के बीच बुढ़िया माता का दरबार आस्था का केंद्र बनता है तो कहीं तरकुलहा देवी मंदिर धार्मिक परंपरा के साथ स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों को संजोए है। गोलघर काली मंदिर और जंगल कौड़िया के देवी मंदिर में भी नवरात्र के दिनों में विशेष पूजा-अर्चना होती है।
गोरखपुर के इन मंदिरों की खासियत केवल धार्मिक महत्व तक सीमित नहीं है। इनके साथ स्थानीय इतिहास, लोककथाएं और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था की परंपराएं भी जुड़ी हैं। यही वजह है कि नवरात्र में इन देवी मंदिरों में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।
कुसम्ही जंगल की बुढ़िया माता, जहां वन और आस्था का संगम
बुढ़िया माता मंदिर, कुसम्ही जंगल गोरखपुर के प्रमुख देवी मंदिरों में शामिल है। एयरफोर्स के समीप घने जंगल के बीच स्थित यह मंदिर स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ आसपास के क्षेत्रों के लोगों की भी आस्था का केंद्र है। नवरात्र में यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है। श्रद्धालु माता को नारियल, चुनरी और प्रसाद अर्पित कर मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।
मंदिर से जुड़ी लोकमान्यताओं में देवी के वृद्ध महिला के स्वरूप में प्रकट होने की कथा प्रचलित है। यही लोकविश्वास इस मंदिर को दूसरी जगहों से अलग पहचान देता है। नवरात्र में मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का क्रम शुरू हो जाता है।
तरकुलहा देवी मंदिर में आस्था के साथ इतिहास की झलक
तरकुलहा देवी मंदिर, चौरीचौरा गोरखपुर के प्रसिद्ध देवी मंदिरों में है। इस मंदिर का संबंध स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों से भी जुड़ा है। गोरखपुर जिला प्रशासन के अनुसार पहले यहां जंगल था और तरकुल के पेड़ के नीचे पिंडियों की स्थापना कर देवी की पूजा की जाती थी। डुमरी रियासत के क्रांतिकारी बाबू बंधू सिंह को तरकुलहा देवी का उपासक बताया गया है।
चैत्र और शारदीय नवरात्र में यहां विशेष पूजा होती है। श्रद्धालु देवी के दर्शन के लिए दूर-दराज से पहुंचते हैं। मंदिर की धार्मिक पहचान के साथ इसका ऐतिहासिक पक्ष भी इसे महत्वपूर्ण बनाता है।
जंगल कौड़िया का देवी मंदिर भी बनता है आस्था का केंद्र
जंगल कौड़िया का दुर्गा मंदिर नवरात्र में आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख पूजा स्थल बन जाता है। नवरात्र के दौरान मंदिर में विशेष अनुष्ठान और पूजा-अर्चना होती है। आसपास के गांवों से लोग परिवार के साथ दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
सुबह से मंदिर में देवी के जयकारे सुनाई देते हैं। नवरात्र के अलग-अलग दिनों में देवी के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। ग्रामीण क्षेत्र में स्थित होने के कारण इस मंदिर की आस्था स्थानीय सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी जुड़ी है।
गोलघर काली मंदिर में शहर के बीच देवी की आराधना
गोरखपुर शहर के मध्य स्थित गोलघर काली मंदिर भी नवरात्र में श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहता है। शहर के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। नवरात्र में मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और सजावट की जाती है।
श्रद्धालु माता को नारियल, चुनरी और प्रसाद अर्पित करते हैं। शहर के प्रमुख बाजार क्षेत्र में स्थित होने के कारण नवरात्र के दौरान मंदिर के आसपास धार्मिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं।
फरेंदा का लेहड़ा देवी मंदिर, आर्द्रवन की लोककथा से जुड़ा धाम
गोरखपुर से लगे महराजगंज जिले के फरेंदा क्षेत्र में स्थित अदरौना (लेहड़ा) देवी मंदिर पूर्वांचल के महत्वपूर्ण देवी स्थलों में माना जाता है। महराजगंज जिला प्रशासन के अनुसार मंदिर फरेंदा तहसील मुख्यालय से बृजमनगंज मार्ग पर स्थित है। प्राचीन समय में यह क्षेत्र आर्द्रवन नामक घने जंगल से घिरा था। मंदिर पवह नामक प्राचीन नदी के तट पर स्थित बताया गया है।
मंदिर से जुड़ी लोकश्रुति में इसका संबंध महाभारत काल से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि पांडवों के अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने यहां वनदेवी की आराधना की थी। यह धार्मिक मान्यता है, जिसे स्थानीय परंपरा में पीढ़ियों से बताया जाता रहा है।
नवरात्र में लेहड़ा देवी मंदिर में दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां दर्शन-पूजन के साथ हवन, कन्या पूजन और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा भी निभाई जाती है।
नवरात्र में बदल जाता है गोरखपुर का धार्मिक वातावरण
नवरात्र के दौरान गोरखपुर के इन प्रमुख देवी मंदिरों में आस्था का अलग-अलग रूप दिखाई देता है। कुसम्ही जंगल की बुढ़िया माता में वन और लोकविश्वास का संगम है तो तरकुलहा देवी मंदिर में धर्म के साथ इतिहास की स्मृतियां जुड़ी हैं। जंगल कौड़िया में ग्रामीण समाज की देवी आराधना दिखाई देती है और गोलघर काली मंदिर शहर के बीच श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनता है। वहीं महराजगंज का लेहड़ा देवी मंदिर आर्द्रवन और वनदेवी से जुड़ी लोकमान्यताओं को जीवित रखे हुए है।
