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कुशीनगर के पकड़ी गांव निवासी योगी प्रेमचंद गांव-गांव घूमकर बजाते हैं सारंगी, 20 वर्ष की उम्र में गुरु से सीखी थी कला, माता कामाख्या देवी के भी कर चुके हैं दर्शन
@ राम प्रताप विश्वकर्मा, चाय पंचायत।
गोरखपुर। कभी गांव की पगडंडियों और चौपालों पर सारंगी की धुन सुनाई देना आम बात थी। दूर से आती धुन लोगों को अपनी ओर खींच लेती थी। बच्चे कलाकार के पीछे चल पड़ते और बड़े कुछ देर के लिए अपने काम रोककर सारंगी के सुर सुनते थे। आधुनिक मनोरंजन के साधनों के बढ़ते प्रभाव के बीच अब यह दृश्य कम ही दिखाई देता है। ऐसे समय में कुशीनगर के सुकरौली के पास पकड़ी गांव निवासी योगी प्रेमचंद करीब 25 वर्षों से सारंगी की धुन के सहारे इस लोकपरंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
20 वर्ष की उम्र में गुरु से सीखी सारंगी बजाने की कला
योगी प्रेमचंद के लिए सारंगी केवल एक पारंपरिक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि उनके जीवन और साधना का हिस्सा है। करीब 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने गुरु के साथ घूमते हुए सारंगी बजाना सीखा। गुरु के साथ गांव-गांव भ्रमण करते हुए उन्होंने अलग-अलग धुनों और सारंगी के सुरों को समझा।
समय बीतता गया और गुरु इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनसे सीखी कला आज भी योगी प्रेमचंद के साथ है। गुरु के साथ शुरू हुआ सारंगी बजाने और घूमने का सफर आज भी जारी है।
गांव-गांव घूमकर सुनाते हैं सारंगी की अलग-अलग धुन
योगी प्रेमचंद उत्तर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों के अलावा कई अन्य प्रदेशों में भी भ्रमण कर चुके हैं। वह गांवों और विभिन्न स्थानों पर पहुंचकर सारंगी बजाते हैं और लोगों को अलग-अलग धुन सुनाते हैं।
उनके लिए किसी नए स्थान पर पहुंचना केवल यात्रा नहीं है। वहां के लोगों से मिलना, अपनी सारंगी की धुन सुनाना और कुछ समय उनके बीच बिताना भी इस जीवनशैली का हिस्सा है। इसी भ्रमण के दौरान उन्होंने माता कामाख्या देवी के दर्शन भी किए।
आधुनिक दौर में सिमट रही घुमंतू कलाकारों की परंपरा
एक समय गांवों में घुमंतू साधु और लोक कलाकारों की अलग पहचान हुआ करती थी। वे एक स्थान पर स्थायी रूप से नहीं रहते थे। गांव-गांव घूमकर अपनी कला प्रस्तुत करते और भिक्षा से जीवन-यापन करते थे। सारंगी जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्र उनकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा होते थे।
रेडियो, टेलीविजन से लेकर मोबाइल और इंटरनेट तक मनोरंजन के साधनों में हुए बदलाव ने लोक कलाकारों के सामने भी नई परिस्थितियां पैदा की हैं। सारंगी जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन अब पहले की तुलना में कम सुनाई देती है। ऐसे में योगी प्रेमचंद जैसे कलाकार लोककला की उस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, जो कभी गांवों के सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करती थी।
रोजी-रोटी से बढ़कर है सारंगी
योगी प्रेमचंद के अनुसार, सारंगी उनके लिए केवल रोजी-रोटी का साधन नहीं है। गुरु से मिली यह कला अब उनके जीवन का हिस्सा बन चुकी है। वर्षों तक सारंगी बजाते हुए उन्होंने अनेक गांव और प्रदेश देखे हैं और अलग-अलग लोगों से मुलाकात की है।
उनकी सारंगी की धुन में केवल संगीत नहीं, बल्कि वर्षों की साधना और गुरु की सीख भी दिखाई देती है। गुरु अब उनके साथ नहीं हैं, लेकिन उनके सिखाए सुर आज भी प्रेमचंद की उंगलियों में जीवित हैं।
सारंगी के सुरों में सुनाई देती है बीते लोकजीवन की कहानी
आज जब पारंपरिक वाद्य यंत्रों की आवाज कम होती जा रही है, तब योगी प्रेमचंद जैसे कलाकार लोकपरंपरा की जीवित कड़ी नजर आते हैं। उनकी सारंगी की धुन लोगों का मनोरंजन करने के साथ उन्हें उस दौर की याद भी दिलाती है, जब संगीत किसी मंच तक सीमित नहीं था।
