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रिहाई का परवाना: 20 साल बाद लौटी अम​रमणि दंपत्ति की चमक, खाली हो जाएगा मेडिकल कॉलेज का प्राइवेट वार्ड

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— अमरमणि और उनकी पत्नी मधुमणि की शुक्रवार की देर रात हुई रिहाई, अभी वार्ड में रहेंगे दंपत्ति

आशुतोष मिश्रा

गोरखपुर। करीब 20 साल के बाद जेल से अमर​मणि दंपत्ति की रिहाई का परवाना शुक्रवार की रात जेल से बीआरडी मेडिकल कॉलेज के पुराना प्राइवेट वार्ड में पहुंचा। कवियत्री मधुमिता शुक्ला हत्यांकाड के बाद मणि परिवार पर छाए गर्दिशों के बादल अब छंट जाएंगे। उनकी रिहाई से समर्थकों और शुभचिंतकों खुशी की लहर है। विपक्ष के नेता योगी सरकार पर तरह तरह के आरोप मढ़ रहे हैं। लेकिन जो भी हो, एक बार फिर से बाहर आने पर अमरमणि की खोई चमक लौटने की उम्मीद जगी है।

जानकारों के मुताबिक वर्ष 1980—90 के दशक में जब गोरखपुर का गैंगवार कुख्यात था। तब अमरमणि त्रिपाठी का राजनीतिक कैरियर शुरू हुआ। तत्कालीन बाहुबली वीरेंद्र प्रताप शाही और पंडित हरिशंकर तिवारी के बीच रंजिश बढ़ने पर अमरमणि त्रिपाठी को राजनीतिक उड़ान मिली थी। उन्होंने वर्ष 1981 में पहली बार महराजगंज जिले के लक्ष्मीपुर विधान सभा क्षेत्र से विधायक बनने का प्रयास किया। त वीरेंद्र प्रताप शाही के विरोध में अमरमणि को पंडित हरिशंकर तिवारी का साथ मिला। वर्ष 1989 अमरमणि विधायक बने। राजनीति में चमके अमरमणि को प्रदेश सरकार में मंत्री बनने का मौका मिला। अमरमणि की मुश्किलें वर्ष 2003 में तब बढ़ीं, जब उनका नाम कवियित्री मधुमिता शुक्ला की हत्या में नाम सामने आया। राजनीति गर्म होने पर अमरमणि का राजनीतिक करियर दांव पर लग गया। इस बीच वर्ष 2006 में विधान सभा जीतकर उन्होंने खुद को मजबूत करने का प्रयास किया। लेकिन मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में आजीवन कारावास ​की सजा होने से उनकी चमक बरकरार नहीं रह सकी। पिता के बाद बेटे अमनमणि का नाम सारा हत्याकांड में आया।
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सजा के बाद मेडिकल कॉलेज का प्राइवेट वार्ड बना ठिकाना
जानकारों के अनुसार आजीवन कारावास की सजा मिलने के बाद अमरमणि और उनकी पत्‍‌नी मधुमणि बीमारी का उपचार कराने के लिए मेडिकल कॉलेज के प्राइवेट वार्ड में भर्ती हो गए। प्राइवेट वार्ड का कमरा नंबर 8 और 16 अमरमणि को दिया गया। मेडिकल कॉलेज में रहकर अमरमणि ने खुद को कमजोर नहीं होने दिया। खोई हुई सियासत पाने के लिए लोगों से मिलते जुलते रहे। इकलौते बेटे अमनमणि को राजनीतिक विरासत सौंपने में कामयाब रहे। उन्होंने बेटे अमनमणि को विधायक बनाया। इस बीच भाई अजीतमणि को भी लोकसभा चुनाव लड़ाया। लेकिन कामयाब नहीं हो सके। पूर्व मंत्री श्याम नारायण तिवारी का साथ होने से अमनमणि राजनीतिक गलियारों में खोई हुई चमक पाने का प्रयास करते रहे। लेकिन लखनऊ में ठेकेदार अपहरण कांड होने के बाद मामला दोबारा बिगड़ गया। अपनी विपरीत हालातों से जूझ रहे अमरमणि त्रिपाठी को बेटे अमनमणि के प्रेम के कारण भी झटका लगा। अमनमणि की प्रेमिका सारा की सड़क हादसे में मौत हो गई। इसके बाद अमनमणि पर सारा की हत्या का आरोप लग गया।
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बेटे की गिरफ्तारी पर लगा था गहरा धक्का
यह समय अमरमणि के लिए काफी नाजुक रहा। सारा की दुर्घटना के मौत के बाद अमरमणि और उनकी पत्‍‌नी मधुमणि को भरोसा नहीं हो पा रहा था। उधर अमनमणि को ठेकेदार अपहरण के मामले में पुलिस ने गिरफ्तार किया तो इसकी सूचना से अमरमणि दंपति को गहरा धक्का लगा। एक पल के महसूस हुआ कि अब सब कुछ खत्म हो जाएगा। हालांकि बाद में अमनमणि को जमानत मिल गई। सारा हत्याकांड की जांच लंबे समय तक चली।
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कुछ इस तरह से रहा घटनाक्रम
— 09 मई 2003 को लखनऊ में निशातगंज स्थित पेपर मिल कॉलोनी में कवियत्री मधुमिता शुक्ला की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
— 24 अक्टूबर 2007 को बहुचर्चित हत्याकांड में देहरादून की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने अमरमणि, उनकी पत्नी मधुमणि, भतीजे रोहित चतुर्वेदी और शूटर संतोष राय को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। बाद में नैनीताल हाईकोर्ट ने प्रकाश पांडेय को भी दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
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वीरेंद्र शाही के खिलाफ लड़े चुनाव, किया हार का सामना
वर्ष 1980 में पंडित हरिशंकर तिवारी ने अमरमणि को वीरेंद्र शाही के खिलाफ लक्ष्मीपुर सीट से चुनाव लड़वाया। वीरेंद्र शाही ने अमरमणि को चुनाव में हरा दिया। 1985 में दोबारा वे लक्ष्मीपुर से चुनाव लड़े। फिर चुनाव हार गए। इसके बाद अमरमणि ने अपनी रणनीति बदल ली। कांग्रेस से सदस्यता लेकर 1989 के चुनाव में विधायक बने। इसके बाद उनको वर्ष 1991 और 1993 के विधानसभा चुनाव में हार मिली। कुंवर अखिलेश प्रताप सिंह ने अमरमणि को हरा दिया। वर्ष 1996 में एक बार फिर कांग्रेस के टिकट पर अमरमणि चुनाव जीते। की। तब प्रदेश में भाजपा-बसपा गठबंधन की सरकार बनने पर उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा ज्वाइन कर लिया। भाजपा उनको मंत्री बनाया। ब्राह्मण वोट बैंक के कारण उनकी अहमियत बनी रही। बात उस समय की है कि जब अमरमणि पर लगातार हत्या और अपहरण के केस चल रहे थे। वर्ष 2001 में बस्ती के बड़े कारोबारी के 15 साल के बेटे का अपरहरण हो गया। इससे खूब सियासी घमासान ​मचा। बच्चे के बरामद होने के बाद सामने आया कि अपहरण के बाद उसे अमरमणि के बंगले में छिपाया गया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने तब अमरमणि को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया। वे फिर से 2002 में विधानसभा चुनाव में बसपा के साथ हो गए। बसपा के टिकट पर नौतनवां से जीत हासिल की। इसके बाद मुलायम सिंह की सरकार में भी कैबिनेट में शामिल होने का मौका मिला।
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जेलर लेकर पहुंचे परवाना
अमरमणि और उनकी पत्नी मधुमणि की रिहाई का परवाना जेलर को मिली। इसके बाद वह खुद जेलर बीआरडी मेडिकल कॉलेज गए। दोनों को 25-25 लाख के मुचलके पर रिहा किया गया। उधर शुक्रवार की सुबह सुप्रीम कोर्ट ने उनकी रिहाई पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही मधुमिता की बहन निधि शुक्ला को निराशा हुई है। राजनीतिक दलों में इसको लेकर तरह तरह की प्रतिक्रिया दी जा रही है।
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