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गोरखनाथ मंदिर में श्रीराम कथा का छठा दिन, भरत चरित्र के माध्यम से दिया धर्म और जीवन मूल्यों का संदेश
गोरखपुर। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्री गोरखनाथ मंदिर में आयोजित सप्तदिवसीय श्रीराम कथा के छठे दिन प्रयागराज से पधारे कथा व्यास आचार्य शांतनु महाराज ने श्रीरामचरितमानस के भरत चरित्र का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भरत जी त्याग, प्रेम और समर्पण की प्रतिमूर्ति हैं। उनका चरित्र पवित्र तीर्थ की तरह है, जिसके श्रवण मात्र से जीवन पावन हो जाता है।
आचार्य शांतनु महाराज ने कहा कि मनुष्य को अपने भीतर के दोष और दुर्गुणों का त्याग करना चाहिए। बाहरी शत्रु से तो कभी-कभी बचाव संभव है, लेकिन भीतर प्रवेश कर चुका दोष परिवार और जीवन दोनों को कमजोर कर देता है। उन्होंने कहा कि जीवन में हानि-लाभ, जन्म-मरण, यश-अपयश सब विधि के अधीन हैं, इसलिए हर परिस्थिति में धैर्य और समभाव बनाए रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि अच्छा वक्ता बनने से पहले अच्छा श्रोता बनना आवश्यक है। धैर्यपूर्वक सुनने वाला व्यक्ति ही उचित उत्तर दे सकता है। भारतीय संस्कृति में भरत जी का चरित्र अद्वितीय है। जहां दुनिया में सत्ता के लिए संघर्ष के उदाहरण मिलते हैं, वहीं भरत जी को राज्य मिलने के बाद भी उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया और श्रीराम की चरणपादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित कर स्वयं नंदीग्राम में तपस्वी जीवन व्यतीत किया।
कथा व्यास ने कहा कि भरत जी की एकमात्र कामना श्रीसीताराम के चरणों में प्रेम की वृद्धि थी। उन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की नहीं, केवल प्रभु की भक्ति की अभिलाषा थी। उन्होंने कहा कि संसार के अधिकांश भाई संपत्ति बांटते हैं, लेकिन भरत जैसे भाई विपत्ति बांटते हैं। श्रीराम और भरत का मिलन प्रेम, त्याग और समर्पण का अनुपम उदाहरण है।
आचार्य शांतनु महाराज ने वर्तमान धार्मिक आयोजनों में बढ़ती औपचारिकता पर चिंता जताते हुए कहा कि धार्मिक अनुष्ठानों का उद्देश्य केवल व्यवस्था और दिखावा नहीं, बल्कि जीवन में परिवर्तन लाना होना चाहिए। रामायण का आयोजन तभी सार्थक होगा, जब मनुष्य अपने संबंधों में प्रेम और सद्भाव स्थापित करे।
उन्होंने जयंत प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान श्रीराम शरणागत की रक्षा करने वाले हैं। जयंत को जब कहीं आश्रय नहीं मिला तो अंत में श्रीराम की शरण में जाना पड़ा और प्रभु ने उसे क्षमा कर दिया। उन्होंने कहा कि ब्रह्म परीक्षा का नहीं, जिज्ञासा का विषय है। अहंकार के साथ ईश्वर को परखने का प्रयास करने वालों को सदैव अपमान का सामना करना पड़ता है।
कथा के दौरान उन्होंने भारत की संस्कृति और जीवन मूल्यों की महत्ता बताते हुए कहा कि सनातन परंपरा हमें संतों, मंदिरों, पर्वों और संस्कारों के माध्यम से जीवन जीने की कला सिखाती है।
कथा का समापन आरती और प्रसाद वितरण के साथ हुआ। संचालन डॉ. अरविंद कुमार चतुर्वेदी ने किया। इस अवसर पर योगी कमलनाथ जी महाराज, महंत रविंद्रदास जी महाराज, बालकदास जी, व्यापारी कल्याण बोर्ड के उपाध्यक्ष पुष्पदंत जैन, भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष कामेश्वर सिंह, रामजन्म सिंह, डॉ. प्रदीप राव, यजमान बैजनाथ जायसवाल सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

