मां के जेवर बिके, बेटी के सपने नहीं, मानसी की नजर ओलंपिक स्वर्ण पर

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किक बॉक्सिंग में स्वर्ण पदक जीतकर बढ़ाया परिवार का मान, अब प्रयागराज में कर रहीं कड़ा अभ्यास

पिता बोले—बेटी की उड़ान में आर्थिक संकट नहीं बनने देंगे बाधा

@ रामप्रताप विश्वकर्मा, चाय पंचायत।

गोरखपुर। एक तरफ सीमित आमदनी वाला परिवार और दूसरी तरफ ओलंपिक का सपना। बीच में खड़ी है गोरखपुर की मानसी निषाद, जिसके हौसले के आगे आर्थिक तंगी भी छोटी पड़ती दिखाई देती है। बेटी के खेल को जारी रखने के लिए मां अपने जेवर तक बेच चुकी हैं, लेकिन मानसी के सपनों की चमक जरा भी कम नहीं हुई। किक बॉक्सिंग में स्वर्ण पदक जीत चुकी मानसी अब ओलंपिक में देश के लिए स्वर्ण जीतने का लक्ष्य लेकर प्रयागराज में पसीना बहा रही हैं।
मानसी के लिए रिंग में उतरना महज खेल नहीं है। यह उस संघर्ष का अगला पड़ाव है, जिसकी शुरुआत गांव की पगडंडियों से हुई और अब मंजिल अंतरराष्ट्रीय खेल मंच तक पहुंचने की है।

जेवर बिके, लेकिन हौसला नहीं टूटा
मानसी के खेल में आगे बढ़ने के साथ प्रशिक्षण, प्रतियोगिताओं और यात्रा का खर्च बढ़ता गया। परिवार के लिए हर खर्च जुटाना आसान नहीं था। बेटी की प्रतिभा और लगन को देखते हुए मां ने अपने जेवर तक बेच दिए। परिवार के सामने आर्थिक मुश्किलें थीं, लेकिन बेटी के सपने को रोकने का विकल्प किसी ने नहीं चुना।
मानसी के पिता गंगा निषाद कहते हैं, “बेटी के खेल और उसके सपने के बीच आर्थिक संकट को आड़े नहीं आने देंगे। जितना संभव होगा, हम उसके लिए करेंगे।”
गांव और खेती से जुड़े परिवार के लिए यह सफर आसान नहीं है। फिर भी पिता को भरोसा है कि बेटी मेहनत करती रहेगी तो एक दिन उसकी सफलता परिवार की हर परेशानी पर भारी पड़ेगी।
दौड़ से शुरू हुआ सफर, किक बॉक्सिंग में चमकी प्रतिभा
चौरीचौरा विधानसभा क्षेत्र के ग्राम भैसहा बाढ़न की रहने वाली मानसी वर्तमान में रामपुर वार्ड नंबर-39, भगत चौराहा में परिवार के साथ रहती हैं। खेल के प्रति उनका रुझान शुरू से रहा। दौड़ प्रतियोगिताओं में उन्होंने कई पदक हासिल किए। इसके बाद किक बॉक्सिंग में अपनी पहचान बनाने के लिए मेहनत शुरू की।
23 मई को आगरा में आयोजित किक बॉक्सिंग प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतना उनके लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। इस जीत ने परिवार का विश्वास बढ़ाया और मानसी के भीतर बड़े लक्ष्य को पाने का जुनून और मजबूत कर दिया।
अब हर दिन ओलंपिक की तैयारी
स्वर्ण पदक के बाद मानसी ने रुकने के बजाय लक्ष्य और बड़ा कर लिया। वह ओलंपिक में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतना चाहती हैं। इसी लक्ष्य को लेकर इन दिनों प्रयागराज में प्रशिक्षण ले रही हैं।
प्रशिक्षण के दौरान शारीरिक क्षमता, तकनीक और मुकाबले की तैयारी पर लगातार काम करना पड़ता है। घर से दूर रहकर अभ्यास करना आसान नहीं, लेकिन मानसी के लिए यह दूरी उस मंजिल की ओर बढ़ता कदम है, जिसका सपना उन्होंने बचपन से संजोया है।
पिता के लिए बेटी की जीत पूरे परिवार की जीत
गंगा निषाद कहते हैं कि बेटी ने अब तक जो हासिल किया है, उससे पूरा परिवार गौरवान्वित है। उनका मानना है कि बेटियों को खेल में आगे बढ़ने से रोकने के बजाय उन्हें परिवार का पूरा सहयोग मिलना चाहिए।
उनके शब्दों में, “मेहनत और लगन के साथ आगे बढ़ने पर सफलता जरूर मिलती है। हमारी बेटी आगे बढ़ना चाहती है तो हम उसके साथ हैं।”
मानसी के संघर्ष में छिपा बड़ा सवाल
मानसी की कहानी केवल संघर्ष और सफलता की कहानी नहीं है। यह उन प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की ओर भी ध्यान खींचती है, जिनके सामने संसाधनों की कमी बड़ी चुनौती बन जाती है। प्रशिक्षण, खेल उपकरण, यात्रा और प्रतियोगिताओं का खर्च कई बार प्रतिभा के रास्ते में दीवार खड़ी कर देता है।
मानसी के परिवार ने अपनी क्षमता के अनुसार हर संभव प्रयास किया है। मां के जेवर बिक गए, लेकिन बेटी का अभ्यास नहीं रुका। पिता आर्थिक कठिनाई के बावजूद बेटी को आगे बढ़ाने का संकल्प लिए हैं। अब जरूरत है कि ऐसी प्रतिभाओं को बेहतर प्रशिक्षण और समय पर आर्थिक सहयोग मिले।
मंजिल अभी दूर है, लेकिन कदम थमे नहीं हैं
मानसी की कहानी बताती है कि बड़े सपने हमेशा बड़े संसाधनों से नहीं जन्म लेते। कई बार वे छोटे घरों, सीमित साधनों और बड़ी उम्मीदों के बीच आकार लेते हैं।
मां के जेवर बेटी के खेल के लिए बिक गए। पिता ने आर्थिक संकट के आगे झुकने से इनकार कर दिया। मानसी ने भी मुश्किलों को बहाना नहीं बनाया। अब उनकी निगाह उस दिन पर है, जब दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच पर भारत का तिरंगा लहराए और उनकी मेहनत ओलंपिक स्वर्ण पदक में बदल जाए।

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