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गोरखपुर को जलभराव से बचाने के लिए जरूरी है वैज्ञानिक जलनिकासी तंत्र

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वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष मित्र ने कहा- पहले शहर की ऊंचाई नापनी होगी, फिर तय करना होगा बारिश का पानी आखिर जाएगा कहां

@ राम प्रताप विश्वकर्मा, चाय पंचायत

गोरखपुर। बारिश होते ही शहर में जलभराव की समस्या सामने आ जाती है। सड़कों और मोहल्लों में पानी जमा होने के बाद अक्सर इसका कारण तेज बारिश को माना जाता है, लेकिन वरिष्ठ पत्रकार और इंजीनियर आशुतोष मित्र का मानना है कि गोरखपुर की जलभराव समस्या को केवल अधिक बारिश से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए शहर की भौगोलिक बनावट, सड़क और नालों के स्तर, ढलान तथा अंतिम निकास की वैज्ञानिक तरीके से समीक्षा जरूरी है।

आशुतोष मित्र ने अपने फेसबुक पेज पर लिखे एक विस्तृत आलेख में बताया है कि गोरखपुर राप्ती और रोहिन नदी बेसिन में स्थित है तथा भौगोलिक रूप से कटोरानुमा यानी ‘बाउल शेप्ड’ क्षेत्र है। ऐसे भूभाग में जलनिकासी के लिए नालों का निर्माण करने भर से समस्या का समाधान नहीं हो सकता। सड़क, नाले और अंतिम निकास के बीच ऊंचाई और ढलान का सही होना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने लिखा है कि पानी वहां नहीं जाता, जहां हम चाहते हैं, बल्कि वहां जाता है जहां जमीन उसे जाने देती है। यदि सड़क का स्तर, नाले का तल, पुलिया या आगे की जलनिकासी व्यवस्था उचित स्तर पर नहीं है तो पानी की गति धीमी हो सकती है और वह पीछे भी लौट सकता है। इसलिए नाले की चौड़ाई या उसके निर्माण पर खर्च होने वाली धनराशि से पहले यह देखना जरूरी है कि उसका स्तर सही है या नहीं।

पूरे शहर को एक जलनिकासी तंत्र मानने की जरूरत

आशुतोष मित्र के अनुसार, गोरखपुर में अलग-अलग मोहल्लों के लिए अलग-अलग नाले बनाने के बजाय पूरे शहर को एक समग्र जलनिकासी तंत्र के रूप में देखना होगा। मोहल्ले का पानी किस नाले में जाएगा, वह नाला किस मुख्य नाले से जुड़ेगा और अंततः पानी शहर से कहां निकलेगा, इसकी पूरी श्रृंखला स्पष्ट होनी चाहिए। इस व्यवस्था की किसी एक कड़ी में स्तर या क्षमता की गड़बड़ी होने पर उसका प्रभाव दूसरे क्षेत्रों में भी दिखाई दे सकता है।

उन्होंने गोरखपुर महायोजना-2031 में जलनिकासी के लिए कंटूर सर्वे और शहर को पांच जलनिकासी क्षेत्रों में बांटने की व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि वैज्ञानिक दिशा पहले से निर्धारित है। अब जरूरत इसे जमीन पर अधिक सूक्ष्मता और प्रभावी तरीके से लागू करने की है।

पूरे शहर का हो वैज्ञानिक जलनिकासी परीक्षण

आशुतोष मित्र ने गोरखपुर के लिए स्वतंत्र वैज्ञानिक जलनिकासी परीक्षण कराने की जरूरत बताई है। इसके तहत आधुनिक उपकरणों से पूरे शहर का डिजिटल लेवल सर्वे कराया जाना चाहिए। इसमें सड़क, नाला, पुलिया, तालाब, प्राकृतिक जलमार्ग और अंतिम निकास की वास्तविक ऊंचाई एक समान आधार पर दर्ज की जाए।

इसके बाद नक्शे के माध्यम से यह निर्धारित किया जाए कि प्रत्येक क्षेत्र का वर्षाजल कहां से आएगा, किस रास्ते से जाएगा, किस मुख्य नाले में मिलेगा और अंततः शहर से किस स्थान से बाहर निकलेगा।

जहां ढलान में कमी मिले, उसे ठीक किया जाए। नाले का तल निर्धारित स्तर से ऊंचा मिलने पर उसकी डिजाइन की दोबारा समीक्षा हो। पुलिया जलप्रवाह में बाधा बन रही हो तो उसकी क्षमता और ऊंचाई की जांच की जाए। जिन मुख्य नालों की क्षमता भारी वर्षा के दौरान अपर्याप्त हो, उनकी क्षमता बढ़ाई जाए।

तालाबों और प्राकृतिक जलक्षेत्रों को बनाया जाए समाधान का हिस्सा

उन्होंने तालाबों और प्राकृतिक जलभराव क्षेत्रों को समस्या के बजाय जलनिकासी तंत्र का हिस्सा बनाने पर भी जोर दिया है। भारी वर्षा के दौरान ऐसे क्षेत्र कुछ समय के लिए अतिरिक्त पानी रोक सकते हैं, जिससे मुख्य नालों पर अचानक पड़ने वाला दबाव कम किया जा सकता है।

जहां भूभाग इतना नीचा हो कि गुरुत्वाकर्षण के माध्यम से पानी निकालना संभव न हो, वहां वैज्ञानिक गणना के आधार पर स्थायी पंपिंग व्यवस्था विकसित करने की जरूरत बताई गई है।

गोरखपुर शहर में जलभराव से निजात के लिए सांकेतिक चित्र।

हर निर्माण से पहले तय हो बारिश के पानी का रास्ता

आशुतोष मित्र के अनुसार, नई सड़क, नाले या पुलिया के निर्माण की तकनीकी स्वीकृति से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि उस संरचना से निकलने वाला वर्षाजल आखिर जाएगा कहां। यदि इसका वैज्ञानिक उत्तर उपलब्ध नहीं है तो निर्माण शुरू करने से पहले डिजाइन की समीक्षा की जानी चाहिए।

उन्होंने जलनिकासी के लिए क्रम भी सुझाया है—पहले शहर की ऊंचाई नापी जाए, फिर पानी की प्राकृतिक दिशा समझी जाए, उसके बाद अंतिम निकास तय किया जाए। इसके बाद नाले की क्षमता और डिजाइन निर्धारित हो और अंत में निर्माण कराया जाए।

उनका कहना है कि जलनिकासी में सबसे महंगी गलती खराब निर्माण सामग्री नहीं, बल्कि गलत स्तर निर्धारित करना है। एक बार गलत ऊंचाई पर पक्का नाला बन जाने के बाद वह लंबे समय तक पानी के प्रवाह को प्रभावित कर सकता है।

आशुतोष मित्र ने जलभराव से निपटने के लिए सही सर्वेक्षण, सही स्तर, सही ढलान, पर्याप्त क्षमता और स्पष्ट अंतिम निकास को जरूरी बताया है। उनके अनुसार गोरखपुर को केवल अधिक नालों और पंपों की जरूरत नहीं है, बल्कि समग्र जलनिकासी अभियांत्रिकी की आवश्यकता है। बारिश के पानी को रोकने के बजाय उसके प्राकृतिक प्रवाह को समझकर उसे सही रास्ता देने पर ही जलभराव की समस्या का स्थायी समाधान संभव होगा।

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