गोसेवा से ही प्रकृति, संस्कृति और मानव जीवन की रक्षा संभव : स्वामी राजेंद्रदास

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दिग्विजयनाथ व अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि पर ‘भारतीय संस्कृति एवं गोसेवा’ विषय पर सम्मेलन, घर-घर गोसेवा का आह्वान

गोरखपुर। युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में आयोजित साप्ताहिक सम्मेलन में सोमवार को ‘भारतीय संस्कृति एवं गोसेवा’ विषय पर संतों और विद्वानों ने विचार रखे। वक्ताओं ने गोसेवा को भारतीय संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण, कृषि और मानव जीवन के कल्याण से जोड़ते हुए घर-घर गोसेवा को बढ़ावा देने का आह्वान किया।

सम्मेलन के मुख्य अतिथि वृंदावनधाम से पधारे श्रीमद् जगद्गुरु द्वाराचार्य, अग्रपीठाधीश्वर एवं मलूकपीठाधीश्वर स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य ने कहा कि जिस पीठ के नाम के साथ ही गोरक्षा शब्द जुड़ा है, वहां गोसेवा पर चर्चा और संतों का मार्गदर्शन प्राप्त करना सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि गोसेवा से ही प्रकृति, संस्कृति और मानव जीवन की रक्षा संभव है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य ने भगवान की सुंदर प्रकृति को विषैला बना दिया है। मनुष्य स्थूल वस्तुओं पर अधिक ध्यान देता है, जबकि सूक्ष्म पक्ष की उपेक्षा करता है। यदि सूक्ष्म का विनाश होगा तो स्थूल की सत्ता भी संभव नहीं रहेगी। ऋषियों ने गोमाता के महत्व को इसी दृष्टि से समझाया था। गोमाता स्थूल के साथ सूक्ष्म प्रकृति की भी रक्षा करती हैं।

स्वामी राजेंद्रदास ने कहा कि गोबर और गोमूत्र के उपयोग से ऊसर भूमि को भी उपजाऊ बनाया जा सकता है। ऐसी भूमि में पैदा होने वाला अन्न बल और आयु बढ़ाने वाला होता है। उन्होंने कहा कि वैदिक, ऋषि, देव और प्रकृति-पर्यावरण की संस्कृति में गोमाता का महत्वपूर्ण स्थान है। नर गोवंश की हत्या को उन्होंने धर्म की हत्या और गो रक्षा को धर्म की रक्षा बताया। उन्होंने कहा कि गोरक्षपीठ परिसर में लगभग साढ़े पांच सौ शुद्ध देशी गायों की सेवा की जा रही है।

उन्होंने किसान को देश का अन्नदाता बताते हुए कहा कि जो लोग धर्माचार्य होकर भी गोरक्षा के नाम पर वर्तमान सरकार का विरोध करते हैं और गोरक्षा के विरोधियों का साथ देते हैं, वे गोभक्त नहीं हो सकते।

विष के शमन का श्रेष्ठ साधन गोमाता से प्राप्त गव्य पदार्थ : श्याम बिहारी गुप्ता

उत्तर प्रदेश गोसेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सम्मेलन के मुख्य वक्ता श्याम बिहारी गुप्ता ने कहा कि समुद्र मंथन से निकले रत्नों में विष के साथ कामधेनु भी थीं। विष के शमन का श्रेष्ठ साधन गोमाता से प्राप्त गव्य पदार्थ हैं। उन्होंने कहा कि देशी गाय के दूध और घी के सेवन से भोजन में मौजूद विषाक्त तत्वों के प्रभाव को कम करने में सहायता मिलती है।

उन्होंने कहा कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से खेती और भोजन प्रभावित हो रहा है। जहर मुक्त भोजन के लिए घर-घर गोसेवा और खेतों तक गोबर पहुंचाना आवश्यक है। उन्होंने गोबर गैस को भी ऊर्जा की जरूरत पूरी करने का एक विकल्प बताया।

श्याम बिहारी गुप्ता ने कहा कि गोसेवा केवल गो रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे कई पीढ़ियों की रक्षा होती है। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार लगभग सात हजार गोशालाओं का संचालन कर रही है। घरों में पाली जा रही गायों के लिए भी चारे की व्यवस्था सरकार की ओर से की जा रही है।

गोरक्षपीठ सदैव गोरक्षा के लिए तत्पर : स्वामी विद्या चैतन्य

नैमिषारण्य से आए स्वामी विद्या चैतन्य ने कहा कि गोरक्षपीठ में महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज के समय से ही गोरक्षा और हिंदू संस्कृति की रक्षा के लिए कार्य होता रहा है। उन्होंने कहा कि गोरक्षपीठाधीश्वर एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी प्रदेश में गोरक्षा और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए कार्य कर रहे हैं।

गोमाता नहीं होतीं तो गंगा भी पृथ्वी पर नहीं होतीं : बाल भरतदास

अयोध्या से आए स्वामी बाल भरतदास ने कहा कि पृथ्वी पर यदि गोमाता नहीं होतीं तो गंगा भी नहीं होतीं। सूर्यवंशी राजाओं के जीवन में गोसेवा की प्रधानता रही है। उन्होंने कहा कि जब तक देश में गोमाता के वध पर पाबंदी नहीं लगेगी, तब तक देश विश्वगुरु नहीं बन सकता।

गोमाता का सूर्य की किरणों से संबंध : प्रो. कमलनाथ

श्रृंगेरी मठ, कर्नाटक से आए प्रो. कमलनाथ ने कहा कि गोमाता का सूर्य की किरणों से संबंध माना गया है। गोमूत्र समेत गव्य पदार्थों के समुचित उपयोग से आर्थिक समृद्धि के अवसर भी पैदा हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि ‘गो’ शब्द का एक अर्थ किरण भी है।

गोमाता के दर्शन से देवताओं के दर्शन का पुण्य : लालमणि त्रिपाठी

गीताप्रेस, गोरखपुर के प्रबंधक और विशिष्ट वक्ता लालमणि त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गाय सामान्य पशु नहीं है। जिस प्रकार तुलसी को लक्ष्मी स्वरूप माना जाता है, उसी प्रकार गोमाता को देवताओं का स्वरूप माना गया है। गोमाता के दर्शन, स्पर्श और चरण वंदन को उन्होंने मानव जीवन के पुरुषार्थों की सिद्धि से जोड़ा।

वेदों ने गाय को विश्व की माता कहा : अतुल सिंह

उत्तर प्रदेश गोसेवा आयोग के उपाध्यक्ष अतुल सिंह ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गोमाता का स्थान अत्यंत श्रेष्ठ है। वेदों में कहा गया है, ‘गावो विश्वस्य मातरः।’ उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण की कथा गोसेवा के बिना अधूरी है। श्रीकृष्ण को गोमाता से अत्यंत प्रेम था और वे स्वयं गोसेवा करते थे। गाय से प्राप्त प्रत्येक पदार्थ को उन्होंने प्रकृति के लिए महत्वपूर्ण धन बताया।

सम्मेलन की अध्यक्षता गोरक्षपीठ के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ ने की। वैदिक मंगलाचरण डॉ. रंगनाथ त्रिपाठी ने किया। मृत्युंजय उपाध्याय और गौरव तिवारी ने गोरक्ष अष्टक का पाठ किया। संचालन डॉ. श्रीभगवान सिंह ने किया। इस अवसर पर गुजरात से महंत कमलनाथ, कटक (ओडिशा) से महंत शिवनाथ, हनुमानगढ़ी अयोध्या से महंत राजूदास तथा नीमच (मध्य प्रदेश) से महंत योगी लालनाथ सहित अनेक संत-महात्मा उपस्थित रहे।

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