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भूगोलविद एवं साहित्यकार रणविजय सिंह ने ग्लोब और चार्ट के माध्यम से समझाया विश्व मानचित्र का निर्माण, देशों का क्षेत्रफल और सीमाओं की जटिलता
गोरखपुर। दुनिया का नक्शा केवल देशों की सीमाएं और भूभाग दर्शाने वाली तस्वीर नहीं है। इसकी प्रत्येक रेखा के पीछे इतिहास, राजनीति, सामरिक हित और राष्ट्रीय सुरक्षा की कहानी छिपी होती है। इसी विषय को केंद्र में रखकर युवा चेतना समिति की नियमित वैचारिक श्रृंखला ‘बतकही’ में शनिवार को विश्व मानचित्र, पृथ्वी की संरचना, देशों के क्षेत्रफल और अंतरराष्ट्रीय सीमा विवादों पर गंभीर विमर्श हुआ।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता भूगोलविद, साहित्यकार एवं पूर्व रेल अधिकारी रणविजय सिंह रहे। उन्होंने ग्लोब और विभिन्न चार्टों के माध्यम से प्रतिभागियों को समझाया कि विश्व मानचित्र का निर्माण किस प्रकार हुआ, गोलाकार पृथ्वी को समतल नक्शे पर प्रदर्शित करने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और नक्शे में दिखाई देने वाली सीमाओं के पीछे इतिहास तथा राष्ट्रीय हित किस प्रकार काम करते हैं।
ग्लोब से समझाई पृथ्वी की संरचना
रणविजय सिंह ने ग्लोब की उपयोगिता से चर्चा की शुरुआत की। उन्होंने अक्षांश-देशांतर, दिशाओं, महाद्वीपों, महासागरों और विभिन्न भूभागों को ग्लोब पर दर्शाने की प्रक्रिया को सरल उदाहरणों से समझाया। उन्होंने कहा कि पृथ्वी को वास्तविक अनुपात में समझने के लिए ग्लोब महत्वपूर्ण माध्यम है, जबकि समतल नक्शे पर पृथ्वी को प्रदर्शित करते समय आकार, दूरी और क्षेत्रफल में अंतर दिखाई दे सकता है।
इसके बाद रूस, चीन, अमेरिका, अफ्रीका, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया और भारत जैसे बड़े देशों के क्षेत्रफल की तुलना की गई। उन्होंने बताया कि किसी देश का महत्व केवल उसके भौगोलिक क्षेत्रफल से तय नहीं होता। उसकी भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक संसाधन, समुद्री पहुंच, सीमाएं और सामरिक महत्व भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।
नक्शे में दावा करने से नहीं बदलती वास्तविक स्थिति
कार्यक्रम में विश्व के विभिन्न हिस्सों में जारी सीमा विवादों और राजनीतिक नक्शों पर भी चर्चा हुई। रणविजय सिंह ने भारत के संदर्भ में पड़ोसी देशों के दावे और प्रतिदावे को समझाते हुए कहा कि किसी देश की ओर से किसी भूभाग को अपने नक्शे में शामिल कर लेने मात्र से उसकी वास्तविक स्थिति नहीं बदल जाती।
उन्होंने बताया कि किसी भी सीमा विवाद को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि संबंधित भूभाग पर दावा किसका है, वास्तविक नियंत्रण किसके पास है, प्रशासन कौन चला रहा है और सीमा को लेकर संबंधित पक्षों की स्थिति क्या है।
भारत-चीन सीमा और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चर्चा
भारत की भौगोलिक स्थिति को समझाते हुए हिमालय, अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के सामरिक महत्व पर चर्चा हुई। इस दौरान भारत-चीन सीमा, वास्तविक नियंत्रण रेखा, अरुणाचल प्रदेश, अक्साई चिन, जम्मू-कश्मीर और नियंत्रण रेखा से जुड़े विषयों पर भी प्रतिभागियों की जिज्ञासाओं का समाधान किया गया। नेपाल से जुड़े कुछ सीमा विवादों पर भी चर्चा हुई।
वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि किसी छोटे पर्वतीय क्षेत्र, दर्रे, द्वीप या समुद्री मार्ग का महत्व केवल उसके आकार से नहीं बल्कि उसकी भौगोलिक और सामरिक स्थिति से निर्धारित हो सकता है।
नक्शा अब केवल भूगोल का विषय नहीं
‘बतकही’ में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि आज नक्शे केवल भूगोल की किताबों तक सीमित नहीं हैं। वे इतिहास, कूटनीति, व्यापार, प्राकृतिक संसाधन, सामरिक मार्ग और राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़े हुए हैं।
चर्चा के दौरान यह विचार भी सामने आया कि जहां सामान्य दृष्टि किसी पहाड़ को केवल भौगोलिक संरचना के रूप में देखती है, वहीं रणनीतिक दृष्टि उसे महत्वपूर्ण मार्ग के रूप में देख सकती है। इसी तरह समुद्र केवल जलराशि नहीं बल्कि व्यापार और सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र हो सकता है।
सवाल-जवाब से आगे बढ़ी ‘बतकही’
कार्यक्रम की खासियत यह रही कि यह केवल एकतरफा व्याख्यान तक सीमित नहीं रहा। प्रतिभागियों ने विश्व मानचित्र, भारत की सीमाओं, भू-राजनीतिक परिस्थितियों और देशों के दावों-प्रतिदावों से जुड़े सवाल पूछे। मुख्य विषय के बाद ‘बात से निकली बात’ का क्रम चला, जिसमें सामाजिक, राष्ट्रीय और समसामयिक विषयों पर भी आत्मीय संवाद हुआ।
कार्यक्रम में समिति के अध्यक्ष मांधाता सिंह, पूर्व सूचना आयुक्त हर्षवर्धन शाही, आरोग्य मंदिर के निदेशक डॉ. विमल मोदी, वरिष्ठ पत्रकार जगदीश लाल श्रीवास्तव, पर्यावरणविद एस.ए. रहमान, डॉ. भगवान सिंह, प्रोफेसर डॉ. विजय कुमार, प्रोफेसर डॉ. राजवंत राव, आशुतोष मिश्र, राजेश कुमार पांडेय, रामपाल सिंह, अखिलेश ओझा, आशुतोष सिंह तथा सुधांशु चंद्रा सहित युवा चेतना समिति से जुड़े अनेक प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अंत में इस बात पर सहमति बनी कि प्रत्येक नागरिक के लिए देश की सामान्य भौगोलिक जानकारी होना आवश्यक है। किसी भी नक्शे अथवा सीमा विवाद को समझते समय भावनाओं के साथ तथ्य, इतिहास और वास्तविक स्थिति को भी ध्यान में रखना चाहिए।
‘बतकही’ ने यह संदेश दिया कि नक्शे पर खिंची सीमा की रेखा केवल स्याही की लकीर नहीं होती, बल्कि उसके पीछे किसी राष्ट्र का इतिहास, भूगोल, सुरक्षा और संप्रभुता जुड़ी होती है।
