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प्राचीन भारतीय कला में धर्म-दर्शन और मानवीय संवेदनाओं का समन्वय, गोरखपुर में प्रो. ध्यानेन्द्र दुबे ने बताए कला के विविध आयाम

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गंगोत्री देवी महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय में ‘प्राचीन भारतीय कला के विविध आयाम’ विषय पर विशिष्ट व्याख्यान

गोरखपुर। प्राचीन भारतीय कला केवल सौंदर्यबोध की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय समाज, धर्म, दर्शन, प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं का सजीव दस्तावेज है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति की व्यापकता को समझने के लिए उसके कलात्मक आयामों का अध्ययन आवश्यक है। यह विचार दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के प्रो. ध्यानेन्द्र नारायण दुबे ने व्यक्त किए।

गंगोत्री देवी महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचीन इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग की ओर से गुरुवार को महाविद्यालय सभागार में ‘प्राचीन भारतीय कला के विविध आयाम’ विषय पर विशिष्ट व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्य डॉ. पूनम शुक्ला ने की। मुख्य वक्ता प्रो. ध्यानेन्द्र नारायण दुबे रहे। विशिष्ट अतिथि गंगोत्री देवी शिक्षण संस्थान के प्रबंध निदेशक आशुतोष मिश्रा और उप प्राचार्य डॉ. प्रियंका त्रिपाठी उपस्थित रहीं।

प्रो. दुबे ने कहा कि भारतीय कला के विकास पर धार्मिक मान्यताओं और दार्शनिक चिंतन का गहरा प्रभाव रहा है। प्राचीन साहित्य और सुभाषितों में प्रकृति, मानव जीवन तथा कला के विभिन्न रूपों का उल्लेख मिलता है। मानव मन में उत्पन्न भावों, प्रकृति और मनुष्य के संबंध तथा भाव एवं रस की अभिव्यक्ति में कला की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

उन्होंने चित्रकला, स्थापत्य, लेखन, गायन, नृत्य और संगीत की परंपराओं पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि इन कलाओं ने न केवल मानव जीवन को अभिव्यक्ति दी, बल्कि समाज और संस्कृति को जोड़ने का भी कार्य किया। स्थापत्य कला की चर्चा करते हुए उन्होंने प्राचीन भवनों और मंदिरों में प्रयुक्त अलंकरणों, प्रतिमाओं तथा उनके प्रतीकात्मक स्वरूप की जानकारी दी।

मंदिर वास्तुकला के विकासक्रम को समझाते हुए प्रो. दुबे ने गर्भगृह, स्तंभ और परिक्रमा पथ की संरचना के साथ नागर, द्रविड़ और वेसर शैलियों की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डाला। प्राचीन भारतीय मूर्तिकला के संदर्भ में उन्होंने शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध और जैन परंपराओं में विकसित देव-प्रतिमाओं एवं धार्मिक प्रतीकों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि मूर्तियां केवल उपासना का माध्यम नहीं थीं, बल्कि तत्कालीन धार्मिक विश्वासों, सांस्कृतिक चेतना और दार्शनिक विचारों की अभिव्यक्ति भी थीं।

सारनाथ के अशोक स्तंभ और धर्मचक्र का किया उल्लेख

बौद्ध कला की चर्चा करते हुए प्रो. दुबे ने स्तूप और चैत्य परंपरा के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने सारनाथ के अशोक स्तंभ के चार सिंहों और धर्मचक्र का उल्लेख करते हुए उनमें निहित धार्मिक एवं कलात्मक अभिव्यक्ति को समझाया। बौद्ध दर्शन के मध्यम मार्ग की अवधारणा की चर्चा करते हुए उन्होंने इसे जीवन में संतुलन, संयम और विवेक का संदेश देने वाली परंपरा बताया।
उन्होंने भारत की सूर्योपासना परंपरा पर भी प्रकाश डाला। दक्षिण भारत से लेकर मगध और देश के अन्य क्षेत्रों तक सूर्योपासना के विस्तार तथा विभिन्न क्षेत्रों में विकसित धार्मिक मान्यताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय कला परंपरा में विविधता के बावजूद व्यापक सांस्कृतिक निरंतरता दिखाई देती है।

सांस्कृतिक विरासत को समझने का अवसर

अध्यक्षीय संबोधन में प्राचार्य डॉ. पूनम शुक्ला ने कहा कि ऐसे शैक्षणिक आयोजन छात्राओं को पुस्तकीय ज्ञान से आगे बढ़कर भारत की प्राचीन कला, इतिहास और संस्कृति को समझने का अवसर देते हैं। सांस्कृतिक विरासत का अध्ययन नई पीढ़ी में अपने इतिहास और परंपराओं के प्रति समझ विकसित करता है।

प्रबंध निदेशक आशुतोष मिश्रा ने कहा कि भारतीय कला और संस्कृति देश की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार हैं। आधुनिक शिक्षा के साथ विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से परिचित कराना भी आवश्यक है। उन्होंने महाविद्यालय में ऐसे अकादमिक और बौद्धिक कार्यक्रमों को निरंतर प्रोत्साहित करने की बात कही।

उप प्राचार्य डॉ. प्रियंका त्रिपाठी ने व्याख्यान को छात्राओं के बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विकास के लिए उपयोगी बताया। कार्यक्रम में श्रीमती प्रत्या उपाध्याय, डॉ. संगीता पांडेय, डॉ. रेनू गौड़, डॉ. कुमुद त्रिपाठी, डॉ. सीमा श्रीवास्तव, डॉ. सुषमा मिश्रा, डॉ. श्रुति त्रिपाठी, डॉ. शिवांगी त्रिपाठी, डॉ. शीला त्रिपाठी, डॉ. गरिमा सिंह, प्रिया, डॉ. तृप्ति सिंह, डॉ. विकास गुप्ता, डॉ. उगेश सहित शिक्षक-शिक्षिकाएं, छात्राएं और कर्मचारी उपस्थित रहे।

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