स्मृतियों को कविता में ढालती है संवेदनशील दृष्टि : विश्वनाथ प्रसाद तिवारी

IMG_20261027_113318

Estimated reading time: 1 minute

डॉ. प्रतिभा गुप्ता के काव्य संग्रह ‘यादों को फिर से मुस्कुराने दो’ का लोकार्पण, साहित्य और चिकित्सा के अंतर्संबंधों पर हुआ विमर्श

गोरखपुर। साहित्य केवल अतीत की स्मृतियों को संजोने का माध्यम नहीं, बल्कि वर्तमान को संवेदनशील बनाने और भविष्य के लिए नई संभावनाएं तलाशने का भी सशक्त आधार है। कविता मनुष्य के अंतर्मन को परिष्कृत करती है और जीवन के अनुभवों को नए अर्थ देती है। यह विचार रविवार को बैंक रोड स्थित होटल विवेक उत्सव लॉन में वरिष्ठ चिकित्सक एवं कवयित्री डॉ. प्रतिभा गुप्ता के काव्य संग्रह ‘यादों को फिर से मुस्कुराने दो’ के लोकार्पण समारोह में सामने आया। साहित्य अकादेमी के पूर्व अध्यक्ष पद्मश्री प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी सहित साहित्य और शिक्षा जगत के विद्वानों ने कृति पर विचार व्यक्त करते हुए सृजन में परिश्रम, मानवीय संवेदना और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के महत्व को रेखांकित किया।

समारोह में गोरखपुर के महापौर डॉ. मंगलेश श्रीवास्तव ने काव्य संग्रह का लोकार्पण किया। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. सुरेंद्र दुबे ने अध्यक्षता की, जबकि गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार राय विशिष्ट वक्ता रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की वंदना से हुआ। साहित्य, चिकित्सा और संस्कृति के क्षेत्र से जुड़े लोगों की उपस्थिति में कविता की सामाजिक प्रासंगिकता और जीवन में स्मृतियों की भूमिका पर चर्चा हुई।

प्रतिभा को निखारने के लिए निरंतर परिश्रम जरूरी : विश्वनाथ प्रसाद तिवारी

मुख्य अतिथि पद्मश्री प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि प्रतिभा के साथ निरंतर परिश्रम और साधना जुड़ जाए, तभी सार्थक सृजन संभव होता है। उन्होंने कहा, “प्रतिभा एक प्रतिशत और कठिन परिश्रम 99 प्रतिशत होता है।” साहित्यिक उपलब्धि के लिए अध्ययन, चिंतन और अनुभवों को आत्मसात करने की निरंतर प्रक्रिया आवश्यक है।

उन्होंने नई पीढ़ी की साहित्य के प्रति घटती अभिरुचि पर चिंता जताई। कहा कि साहित्य मनुष्य में विचारशीलता और संवेदनशीलता विकसित करता है। ऐसे में युवाओं का साहित्य से जुड़ाव बनाए रखना जरूरी है, ताकि समाज में वैचारिक गंभीरता और सांस्कृतिक चेतना समृद्ध हो सके।

कविता मनुष्य में संवेदना और मानवीयता जगाती है : प्रो. सुरेंद्र दुबे

अध्यक्षीय संबोधन में पूर्व कुलपति प्रो. सुरेंद्र दुबे ने कहा, “जो कविता लिखता है, वह अराजक नहीं हो सकता।” उन्होंने कविता को मानवीय मूल्यों, करुणा और संवेदनशीलता से जोड़ते हुए भारतीय ज्ञान-परंपरा के महत्व पर प्रकाश डाला। कहा कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को जानने और समझने से ही मनुष्य समय तथा जीवन के अनुभवों का वास्तविक महत्व पहचान पाता है।

उन्होंने डॉ. प्रतिभा गुप्ता को काव्य संग्रह के प्रकाशन पर बधाई देते हुए उनकी साहित्यिक साधना की सराहना की। उनके अनुसार, कविता की सार्थकता केवल भावों की अभिव्यक्ति में नहीं, बल्कि पाठक के भीतर जीवन और समाज को देखने की संवेदनशील दृष्टि विकसित करने में भी है।

चिकित्सक शरीर का, कवि अंतर्मन का उपचार करता है : प्रो. अनिल राय

विशिष्ट वक्ता प्रो. अनिल कुमार राय ने चिकित्सा और साहित्य के बीच संबंधों की व्याख्या करते हुए कहा कि दोनों ही विधाएं मनुष्य, उसकी पीड़ा और अनुभूतियों को समझने की मांग करती हैं। चिकित्सक शरीर की संरचना और व्याधियों का सूक्ष्म अध्ययन करता है, जबकि कवि शब्दों, प्रतीकों और भावनाओं के माध्यम से मनुष्य के अंतर्मन तक पहुंचता है।

उन्होंने कहा कि चिकित्सक शारीरिक व्याधियों से मुक्ति दिलाने का प्रयास करता है, जबकि साहित्य मनुष्य की संवेदनाओं को परिष्कृत करने में भूमिका निभाता है। इस संदर्भ में उन्होंने चिकित्सक-साहित्यकार डॉ. संजय चतुर्वेदी और डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी के साहित्यिक योगदान का भी उल्लेख किया।

काव्य संग्रह की समीक्षा करते हुए प्रो. राय ने कहा, “अतीत की कैदी नहीं हैं इनकी स्मृतियाँ।” उन्होंने कहा कि डॉ. प्रतिभा गुप्ता की कविताएं केवल बीते समय का स्मरण नहीं करातीं, बल्कि वर्तमान से संवाद करते हुए भविष्य के अधिक सुंदर और संवेदनशील संसार की कल्पना भी करती हैं। स्मृतियां इस संग्रह में अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ने वाले भावनात्मक सूत्र के रूप में उभरती हैं।

अपने संबोधन में उन्होंने मंच पर उपस्थित अपने गुरुओं के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए कहा कि उनके साथ एक ही मंच पर बैठना उनके लिए विशेष सम्मान की बात है।

महापौर डॉ. मंगलेश श्रीवास्तव ने कहा कि लेख में व्यक्त अनुभूतियों को कविता के रूप में प्रस्तुत करना कठिन कार्य है। कविता में भावों की सघनता, शब्दों का चयन और लयात्मक अभिव्यक्ति विशेष महत्व रखते हैं। सीमित शब्दों में व्यापक जीवनानुभवों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करना रचनाकार की सृजनात्मक क्षमता की कसौटी है। उन्होंने डॉ. प्रतिभा गुप्ता के साहित्यिक प्रयास की सराहना की।

साहित्य और चिकित्सा जगत के लोग रहे मौजूद

समारोह में बीआरडी मेडिकल कॉलेज की पूर्व प्रोफेसर डॉ. राधा जीना, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. आरपी शुक्ला, डॉ. शिव शंकर शाही, डॉ. अश्विनी अग्रवाल, डॉ. अमित मित्तल, डॉ. प्रदीप गुप्ता, डॉ. एससी वैश्य, डॉ. विमल मोदी, डॉ. राजेश गुप्ता, डॉ. पीसी शाही, डॉ. मधुबाला, डॉ. अंजू श्रीवास्तव, डॉ. नवनीत जयपुरियार, डॉ. सुगंधा भारती, डॉ. आरके पांडेय, डॉ. अनुभूति दुबे, डॉ. बबिता शुक्ला, डॉ. एके चतुर्वेदी, डॉ. सत्या पांडेय और डॉ. दीप्ति चतुर्वेदी सहित बड़ी संख्या में चिकित्सक उपस्थित रहे।

इसके अतिरिक्त महेश गर्ग, सीए अनुपम गुप्ता, अचिन्त्य लहरी, मान्धाता सिंह, अंकित मिश्र, अखिलेश ओझा, विनोद पांडेय, नवीन पांडेय, अमरनाथ जायसवाल, रामसमुझ संवरा और सुधांशु चंद्र वर्मा सहित साहित्यप्रेमियों, शिक्षाविदों और प्रबुद्ध नागरिकों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं रंगकर्मी डॉ. अमृता सरकारी जयपुरिया ने किया। समापन पर डॉ. क्यूरी गुप्ता और डॉ. तन्वी गुप्ता ने आभार व्यक्त किया। आयोजक सर्वांग हॉस्पिटल के निदेशक डॉ. एपी गुप्ता ने अतिथियों और प्रतिभागियों के प्रति कृतज्ञता जताई।

काव्य संग्रह के लोकार्पण के अवसर पर हुई चर्चा ने साहित्य की उस भूमिका को रेखांकित किया, जो व्यक्तिगत स्मृतियों को व्यापक मानवीय अनुभवों से जोड़ती है।

Leave a Reply