Gorakhpur News: रावण से ताजिया तक मुन्नू पेंटर की अनोखी कला

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दशहरे पर रावण का पुतला, मुहर्रम में ताजिया बनाकर दे रहे भाईचारे का संदेश; बेटे अफजल समेत पूरा परिवार निभा रहा परंपरा

चाय पंचायत, गोरखपुर।

त्योहार अलग-अलग, आस्थाएं अलग-अलग, लेकिन हाथों का हुनर एक और दिल में बसता है आपसी भाईचारा। कोई दशहरे पर रावण का पुतला बनाता है तो कोई मुहर्रम में ताजिया सजाता है। बेनीगंज निवासी मुन्नू पेंटर की जिंदगी में ये दोनों परंपराएं एक साथ दिखाई देती हैं। उनकी कला की खासियत यही है कि वह हिंदू और मुस्लिम समुदायों के धार्मिक आयोजनों के लिए अपनी कारीगरी से जुड़ते हैं। बांस, कागज, धागे और रंगों से आकार लेती उनकी कलाकृतियां गोरखपुर की गंगा-जमुनी तहजीब की ऐसी तस्वीर पेश करती हैं, जिसमें हुनर की कोई धार्मिक सीमा नहीं है।

इन दिनों मुन्नू पेंटर बड़हलगंज की रामलीला के लिए 35 फीट ऊंचा रावण का पुतला तैयार करने में जुटे हैं। पुतले का ढांचा खड़ा करने से लेकर चेहरे की बनावट, रंग-सज्जा और अंतिम रूप देने तक हर चरण में उनकी कारीगरी दिखाई देती है। ऊंचाई के अनुरूप पुतले को आकार देना और उसे आकर्षक बनाना आसान काम नहीं है। इसके लिए अनुभव के साथ धैर्य और लगातार मेहनत की जरूरत होती है। दशहरे पर जब रामलीला के मंचन के बीच रावण का पुतला खड़ा होगा, तब उसके पीछे मुन्नू और उनके परिवार की कई दिनों की मेहनत भी नजर आएगी।

बेटे अफजल समेत पूरा परिवार बंटाता है हाथ

मुन्नू पेंटर की इस कला में उनके बेटे अफजल और परिवार के अन्य सदस्य भी साथ देते हैं। पुतला बनाने का काम केवल बांस और कागज जोड़ने तक सीमित नहीं है। पहले ढांचे को आकार दिया जाता है, फिर उसके अलग-अलग हिस्सों को तैयार कर जोड़ा जाता है। इसके बाद चेहरे की बनावट, रंगों और सजावट के जरिये पुतले को अंतिम रूप दिया जाता है। हर हिस्से में तालमेल जरूरी होता है। परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर काम करने से यह हुनर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचने की राह भी बनाता है।

मुन्नू पेंटर की कारीगरी का दायरा केवल बड़हलगंज की रामलीला तक सीमित नहीं है। वह अन्य स्थानों के लिए भी 10 से 15 फीट तक ऊंचे रावण के पुतले तैयार करते हैं। अलग-अलग आयोजनों की जरूरत के अनुसार पुतलों का आकार और सजावट तय की जाती है। इस समय 35 फीट के पुतले को तैयार करना उनके अनुभव और कौशल की एक और परीक्षा है।

मुहर्रम में ताजिया, दशहरे पर रावण

मुन्नू पेंटर की पहचान का दूसरा पहलू मुहर्रम के लिए ताजिया तैयार करना है। एक ओर दशहरे पर रावण का पुतला बनाकर वह रामलीला की परंपरा से जुड़ते हैं, तो दूसरी ओर मुहर्रम में ताजिया बनाकर दूसरे धार्मिक आयोजन के लिए अपनी कला का योगदान देते हैं। उनके लिए दोनों काम कारीगरी, मेहनत और जिम्मेदारी से जुड़े हैं।

उनकी यह भूमिका सामाजिक सौहार्द की उस परंपरा की याद दिलाती है, जहां अलग-अलग समुदायों के लोग एक-दूसरे के त्योहारों और आयोजनों में अपनी-अपनी भूमिका निभाते रहे हैं। मुन्नू पेंटर का परिवार भी इसी काम में उनके साथ खड़ा है। उनकी कला का इस्तेमाल अलग-अलग धार्मिक अवसरों पर होता है, लेकिन उसे आकार देने वाले हाथ वही हैं।

हुनर जोड़ता है दिलों के तार

मुन्नू पेंटर की कहानी इसलिए खास है, क्योंकि इसमें भाईचारे का संदेश किसी भाषण या नारे से नहीं, बल्कि रोजमर्रा के काम से सामने आता है। उनके हाथों से तैयार रावण का पुतला और ताजिया भले ही अलग-अलग धार्मिक परंपराओं का हिस्सा हों, लेकिन दोनों के निर्माण में लगने वाला श्रम, लगन और कलात्मकता एक जैसी है।

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