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यश भारती सम्मान से अलंकृत चिकित्सक ने गोरखपुर में बनाई विशिष्ट पहचान, भोजपुरी में स्वास्थ्य वार्ताओं से लेकर सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तक रहा योगदान
☕ आशुतोष मिश्र, चाय पंचायत
गोरखपुर। चिकित्सा को सेवा और संवेदना का माध्यम बनाने वाले वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक डा. राम रतन बनर्जी का निधन हो गया। वह 90 वर्ष के थे। होम्योपैथी के प्रचार-प्रसार, निर्धनों को उपचार उपलब्ध कराने और स्वास्थ्य के प्रति जनजागरूकता फैलाने में करीब सात दशक तक सक्रिय रहे डा. बनर्जी को वर्ष 2016 में उत्तर प्रदेश सरकार ने यश भारती सम्मान से अलंकृत किया था। उनका निधन गोरखपुर के चिकित्सा जगत के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र के लिए भी अपूरणीय क्षति है।
डा. बनर्जी की पहचान केवल एक कुशल चिकित्सक के रूप में नहीं थी। अनुशासन, समय की पाबंदी और मानवीय संवेदना उनके व्यक्तित्व के प्रमुख गुण थे। उन्होंने अपने चिकित्सकीय जीवन में जरूरतमंदों की सहायता को विशेष महत्व दिया। निःशुल्क चिकित्सा शिविरों, औषधि वितरण और दातव्य चिकित्सालयों के सहयोग के माध्यम से उन्होंने चिकित्सा सेवा को समाज के वंचित वर्गों तक पहुंचाने का प्रयास किया। स्वास्थ्य संबंधी विषयों को आमजन की भाषा में प्रस्तुत कर जागरूकता फैलाना भी उनके कार्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
स्वर्ण पदक से लेकर डॉक्टरेट तक का सफर
तीन जून 1936 को गोरखपुर में जन्मे डा. राम रतन बनर्जी की प्रारंभिक शिक्षा राजकीय जुबिली इंटर कालेज में हुई। वर्ष 1952 में सेंट एंड्रयूज कालेज से इंटरमीडिएट और 1954 में विज्ञान स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने होम्योपैथी को अपना कार्यक्षेत्र चुना। वर्ष 1959 में कलकत्ता होम्योपैथिक मेडिकल कालेज एवं हास्पिटल से स्वर्ण पदक के साथ चिकित्सा शिक्षा पूरी की। इसके बाद चिकित्सा सेवा को ही अपने जीवन का ध्येय बनाया। वर्ष 1975 में न्यूयार्क स्थित द होमियो इंस्टीट्यूट आफ मेडिसिन से होम्योपैथिक विज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।
वर्ष 1959 में शुरू हुआ उनका चिकित्सकीय सफर लगभग सात दशक तक जारी रहा। गोरखपुर के बेनीगंज-रानीगोला स्थित संतोष होमियो सेवाश्रम उनकी चिकित्सा गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना। यहां उन्होंने रोगियों के उपचार के साथ गरीब और जरूरतमंद लोगों की सहायता पर जोर दिया। रामकृष्ण समिति सहित विभिन्न दातव्य चिकित्सालयों को भी उनका सहयोग मिलता रहा। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय होम्योपैथिक संगोष्ठियों में सहभागिता के माध्यम से उन्होंने अपने अनुभव और विचार साझा किए।
चिकित्सा जगत में नेतृत्वकारी भूमिका
होम्योपैथी के क्षेत्र में उनके लंबे योगदान को वर्ष 2016 में यश भारती सम्मान के रूप में सार्वजनिक मान्यता मिली। वह होम्योपैथिक मेडिकल एसोसिएशन आफ इंडिया की गोरखपुर इकाई के करीब एक दशक तक अध्यक्ष रहे। गोरखपुर जिला होम्योपैथिक एसोसिएशन और होम्योपैथिक लीग से भी नेतृत्वकारी भूमिका में जुड़े रहे। अंतरराष्ट्रीय होम्योपैथिक संगठनों और चिकित्सा पत्रिकाओं से संबद्धता के माध्यम से भी उन्होंने अपनी सक्रियता बनाए रखी।
भोजपुरी में स्वास्थ्य की बात, जनजागरूकता को दी नई दिशा
डा. बनर्जी की विशेषता थी कि वह स्वास्थ्य संबंधी विषयों को आम लोगों तक उनकी अपनी भाषा में पहुंचाने पर जोर देते थे। हिंदी, अंग्रेजी, बंगला और भोजपुरी पर उनकी अच्छी पकड़ थी। लैटिन भाषा का भी उन्हें ज्ञान था। आकाशवाणी गोरखपुर से भोजपुरी में प्रसारित उनकी स्वास्थ्य संबंधी वार्ताएं जनजागरूकता का माध्यम बनीं। दूरदर्शन और क्षेत्रीय टेलीविजन चैनलों पर भी उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रम प्रस्तुत किए।
रश्मि विजन चैनल पर उनके स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम ‘हेल्थ प्लस’ के 101 एपिसोड प्रसारित हुए। चिकित्सा पत्रिकाओं में लेख लिखने के साथ उन्होंने ‘चिकित्सा में अंधविश्वास’ जैसे विषयों पर भी लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया। चिकित्सा संबंधी जानकारी को सरल भाषा में प्रस्तुत करने की उनकी यह पहल उन्हें अन्य चिकित्सकों से अलग पहचान देती थी।
चिकित्सा से आगे सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ाव
डा. राम रतन बनर्जी का सामाजिक जीवन भी उतना ही सक्रिय था जितना उनका चिकित्सकीय जीवन। वह गोरखपुर की ऐतिहासिक दुर्गाबाड़ी बंगाली समिति के संरक्षक थे। शहर में सार्वजनिक दुर्गापूजा की प्राचीन परंपरा और बंगाली समाज की सांस्कृतिक विरासत से उनका गहरा जुड़ाव रहा। ऐतिहासिक दस्तावेजों और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी जानकारियों को सामने लाने में भी उन्होंने भूमिका निभाई। वह आर्यनगर रामलीला समिति सहित विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़े रहे।
खेल और रंगमंच के क्षेत्र में भी उनकी रुचि रही। विद्यार्थी जीवन में वह हॉकी और फुटबाल के अच्छे खिलाड़ी थे। वर्ष 1951 से 1954 के बीच सेंट एंड्रयूज कालेज की हॉकी टीम का नेतृत्व किया। अंग्रेजी, हिंदी और बंगला नाटकों में अभिनय के लिए उन्हें विद्यार्थी जीवन में सम्मान मिला। वाद-विवाद प्रतियोगिताओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही।
परिवार में आगे बढ़ रही सेवा की परंपरा
डा. बनर्जी के परिवार में चिकित्सा और समाजसेवा की परंपरा आगे बढ़ रही है। उनके पुत्र डा. रूप कुमार बनर्जी भी होम्योपैथिक चिकित्सक हैं। पौत्र डा. सौम्यो रतन बनर्जी और डा. अरुणिमा बनर्जी भी परिवार की चिकित्सा एवं सेवा संबंधी गतिविधियों से जुड़े हैं। संतोष होमियो सेवा धाम के माध्यम से जरूरतमंदों के लिए निःशुल्क चिकित्सा शिविर आयोजित किए जाते रहे हैं।
डा. राम रतन बनर्जी का जीवन चिकित्सा, जनजागरूकता और सामाजिक प्रतिबद्धता के समन्वय का उदाहरण रहा। उन्होंने अपने लंबे कार्यकाल में उपचार के साथ लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में योगदान देने का प्रयास किया। उनके निधन से गोरखपुर ने ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया है, जिसकी पहचान चिकित्सा सेवा के साथ मानवीय संवेदना और सामाजिक सक्रियता से जुड़ी रही। उनके कार्य और योगदान लंबे समय तक स्मरण किए जाते रहेंगे।
