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समीकरण और साफ दृष्टिकोण से ममता बचा ले गईं बंगाल

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– चाय पंचायत: अंदर की बात

● आनंद सिंह। पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम के निहितार्थ समझने वालों को पता है कि वहां क्या, कैसे और किसने क्या-क्या किया। ममता बनर्जी अगर अपना गढ़ बचाने में सफल रहीं तो उसके पीछे का समीकरण और दृष्टिकोण बेहद साफ था। अगले साल उत्तर प्रदेश में भी चुनाव होने हैं। बंगाल चुनाव का गणित उत्तर प्रदेश में प्रयोग नहीं होगा, ये मानना गलत होगा। अंदर की खबर तो ये है कि समाजवादी पार्टी अपनी बेस टीम (यादव/मुसलमानों/पिछड़ों) को पूरी तरह से सहेजने के लिए काम शुरू कर चुकी है।
बंगाल में ममता अगर 200 का आंकड़ा पार कर सकीं तो उसके पीछे 3 अहम कारक था; पहला, मुसलमानों को अंत समय तक अपने पक्ष में किये रहना, दूसरा परम्परागत हिन्दू वोटों को सहेजना और तीसरा अपनी 10 साल की बेहतरीन योजनाओं का खूब बढ़िया तरीके से प्रचार प्रसार करना। इन तीनों कारकों की बदौलत ममता बतौर मुख्यमंत्री हैट्रिक लगाने में कामयाब रहीं।
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का अब तक का प्रदर्शन औसत रहा है, ऐसा मेरा मानना है लेकिन विपक्ष मानता है कि यह सरकार हर मोर्चे पर फेल है। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी के सर्वेसर्वा अखिलेश यादव मानते हैं कि प्रदेश की हालत खराब हो गई है और इस सरकार का प्रदर्शन ठीक नहीं रहा। अखिलेश इन दिनों एक चतुर राजनीतिज्ञ की तरह अगले साल की लड़ाई के लिए हथियार पैने कर रहे हैं। खबर ये भी है कि वे पुराने पर दागी लोगों को अपनी टीम से निकालते जा रहे हैं और उन लोगों को अपनी टीम में शामिल कर रहे हैं जो दागी नहीं हैं और सियासत की समझ रखते हैं। इसके साथ ही मुसलमानों को एकजुट करने की भी कोशिश की जा रही है। अखिलेश की धर्मपत्नी डिम्पल यादव लगातार सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं, बिजी हैं। अखिलेश के रात के प्रोग्राम भी फेसबुक लाइव के माध्यम से लाखों समर्थकों तक पहुंच रहे हैं और ये उससे कनेक्ट भी हो रहे हैं।
अखिलेश को पता है कि उत्तर प्रदेश का मुस्लिम वोटर अगर एकजुट होकर सपा को वोट करता है तो इन्हीं वोटों के दम पर गोटी लाल हो सकती है। दरअसल, उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों में से करीब 130 से 135 सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमानों का वोट निर्णायक साबित होता है। इनमें से ज्यादातर सीटें पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तराई वाले इलाके और पूर्वी उत्तर प्रदेश में हैं। यहां मुसलमानों का भरोसा हासिल किए बिना किसी भी उम्मीदवार के लिए जीत हासिल करना मुश्किल है। अखिलेश इनका विश्वास हासिल करने के लिए जी तोड़ प्रयास कर भी रहे हैं।
वास्तव में ममता ने जो बंगाल में 27% वोटों पर अपना कब्जा बरकरार रखा, उसने अखिलेश को नई राह दिखाई है। अखिलेश को पता है कि 20 फीसद वोट लेने के लिए उन्हें पापड़ बेलने पड़ेंगे और वो बेल भी रहे हैं। अब ये पापड़ कितना स्वादिष्ट होगा, ये तो अगले साल ही पता चलेगा क्योंकि अल्पसंख्यकों के वोट अब कहीं कहीं राष्ट्रवाद के नाम पर भाजपा को भी मिल रहा है, बुआ मायावती तो इस रेस में पहले से ही हैं।

(ये लेखक के स्वतंत्र विचार हैं।)

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चुस्की की चौपाल, मुद्दे की पड़ताल

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