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मायावती से मुलाकात के बाद बढ़ी अटकलें, 23 अगस्त की महुआपार सभा पर टिकी नजरें; चंद परिवार के राजनीतिक रुख में भी आएगा बदलाव
गोरखपुर। 2027 के विधानसभा चुनाव से करीब एक वर्ष पहले ही चिल्लूपार की सियासत में हलचल तेज हो गई है। भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष अस्मिता चंद के बसपा में जाने की चर्चा ने इस सीट के चुनावी समीकरणों को नए सिरे से चर्चा में ला दिया है। चंद परिवार की बहू अस्मिता लंबे समय से भाजपा में सक्रिय रही हैं। उनकी बसपा सुप्रीमो मायावती से मुलाकात हो चुकी है। अब 23 अगस्त को महुआपार में प्रस्तावित जनसभा को उनके अगले राजनीतिक कदम से जोड़कर देखा जा रहा है।
अस्मिता के हालिया गतिविधियों से भी भाजपा से दूरी की अटकलों को बल मिला है। इंटरनेट मीडिया पर उनके परिचय में भाजपा नेता की जगह समाजसेवी और गोरखपुर की नेता लिखा गया है। उनके बैठने के स्थान पर मायावती की तस्वीर लगाई गई है। भाजपा से जुड़े कई पुराने पोस्ट भी अब नजर नहीं आ रहे हैं। बसपा के विधायक रहे उमाशंकर सिंह के निधन पर उन्होंने श्रद्धांजलि दी। इन घटनाक्रमों के बीच चिल्लूपार में राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म है।
भाजपा से टिकट की दावेदारी के बाद बदला रुख
अस्मिता करीब दस माह पहले ही 2027 में चिल्लूपार से चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुकी हैं। लंबे समय से भाजपा में सक्रिय रहने के कारण टिकट के लिए उनकी दावेदारी भी मानी जा रही थी। अब बसपा से चुनाव लड़ने की संभावना सामने आने के बाद राजनीतिक समीकरणों का आकलन शुरू हो गया है।
चिल्लूपार बसपा के लिए नई जमीन नहीं है। 2007 और 2012 में राजेश त्रिपाठी ने बसपा के टिकट पर जीत दर्ज की थी। 2017 में पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी के पुत्र विनय शंकर तिवारी भी बसपा के टिकट पर विधायक चुने गए। 2022 में विनय शंकर तिवारी सपा के टिकट पर मैदान में उतरे थे। इस बार भी उनकी दावेदारी चर्चा में है।
अस्मिता की एंट्री से त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना
यदि बसपा अस्मिता चंद को प्रत्याशी बनाती है तो चिल्लूपार में भाजपा, सपा और बसपा के बीच मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना है। अस्मिता के सामने बसपा के परंपरागत मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने के साथ ही अपने व्यक्तिगत संपर्क को चुनावी ताकत में बदलने की चुनौती होगी।
दूसरी ओर भाजपा के लिए चुनौती अपने पुराने समर्थक मतों को एकजुट रखने की होगी। अस्मिता लंबे समय से पार्टी में सक्रिय हैं और महिला मोर्चा में प्रदेश स्तर की जिम्मेदारी संभाल चुकी हैं। ऐसे में उनके समर्थकों का रुख चुनावी तस्वीर को प्रभावित कर सकता है। हालांकि यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपने व्यक्तिगत प्रभाव को कितनी मजबूती से चुनावी समर्थन में बदल पाती हैं।
तिवारी परिवार के प्रभाव क्षेत्र में नई चुनौती
चिल्लूपार में हरिशंकर तिवारी परिवार की राजनीतिक विरासत मजबूत रही है। हरिशंकर तिवारी पांच बार विधायक रहे हैं। उनके पुत्र विनय शंकर तिवारी भी विधायक रह चुके हैं। ऐसे में अस्मिता के बसपा से मैदान में आने पर सपा की संभावित रणनीति भी प्रभावित हो सकती है। खासकर तब, जब बसपा अपना परंपरागत मत आधार बनाए रखने में सफल रहती है।
अस्मिता चंद के संभावित दल परिवर्तन का असर चंद परिवार की राजनीति पर भी पड़ेगा। उनके ससुर स्व. राजनारायण चंद ब्लाक प्रमुख रहे। परिवार के स्व. मारकंडेय चंद प्रदेश सरकार में मंत्री रहे। सीपी चंद वर्तमान में गोरखपुर-महराजगंज स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र से एमएलसी हैं।
चंद परिवार पहले भी अलग-अलग राजनीतिक दलों में रहा है। 2012 में सीपी चंद सपा के टिकट पर चुनाव मैदान में थे, जबकि अस्मिता भाजपा में थीं। अब एक बार फिर परिवार के राजनीतिक रास्ते अलग होते दिखाई दे रहे हैं।
अस्मिता स्वयं 2007 में धुरियापार से निर्दल चुनाव लड़ चुकी हैं और उन्हें 7,723 मत मिले थे। परिसीमन के बाद धुरियापार का बड़ा हिस्सा चिल्लूपार में शामिल हो चुका है। ऐसे में 2027 के चुनाव से पहले अस्मिता का संभावित बसपा प्रवेश चिल्लूपार की राजनीति में सिर्फ एक दल बदल नहीं, बल्कि चुनावी समीकरणों के नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है।
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