हिंदी पर महसूस करें गर्व, आगे बढ़कर देना होगा बढ़ावा : आशुतोष मिश्र

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गोरखपुर, चाय पंचायत संवाददाता।
गंगोत्री देवी महिला महाविद्यालय में हिन्दी दिवस पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्या डॉ. पूनम शुक्ला ने किया। मुख्य अतिथि महाविद्यालय के व्यवस्थापक आशुतोष मिश्रा रहे। मुख्य अतिथि ने इस कहा कि हिन्दी विश्व की प्राचीन भाषा है। 14 सितंबर को भारतीय संविधान ने इसे राज भाषा की संज्ञा दी। ए​क दिन हिंदी अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में जानी जाएगी। साल 1947 में जब अंग्रेजी हुकूमत से भारत आजाद हुआ तो उसके सामने भाषा को लेकर सबसे बड़ा सवाल था। क्योंकि भारत में सैकड़ों भाषाएं और बोलियां, बोली जाती है। 6 दिसंबर 1946 में आजाद भारत का संविधान तैयार करने के लिए संविधान का गठन हुआ। संविधान सभा ने अपना 26 नवंबर 1949 को संविधान के अंतिम प्रारूप को मंजूरी दे दी। आजाद भारत का अपना संविधान 26 जनवरी 1950 से पूरे देश में लागू हुआ। लेकिन भारत की कौन सी राष्ट्रभाषा चुनी जाएगी। ये मुद्दा काफी अहम था। काफी सोच विचार के बाद हिंदी और अंग्रेजी को नए राष्ट्र की भाषा चुना गया। संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी को अंग्रेजों के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया था। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी। आज के युवाओं को आगे आकर हिंदी भाषा को बढ़ावा देने में हाथ मिलाना होगा और हिंदी भाषा की देखभाल करने में गर्व महसूस करना होगा। जब हम ऐसा कहते हैं तो हमारा मतलब यह नहीं है कि आप अन्य भाषाओं जैसे अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा से दूर रहें जिसके साथ आप सहज हैं।

युवा पीढ़ी को जोड़ना ज्यादा जरूरी
कार्यक्रम की अध्यक्षता करती हुई महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. पूनम शुक्ला ने विद्यार्थियों को हिंदी भाषा की महत्व बताया। उन्होंने हिंदी भाषा को भी दूसरी भाषाओं की तरह सम्मान देने के लिए छात्राओं को प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि आज के समय में हम पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण कर रहे है जिससे हम अपने विरसे, सभ्याचार और भाषा के ज्ञान को भूलते जा रहे है। अंग्रेजी और अन्य विषयों जैसे गणित और विज्ञान के ज्ञान को प्रदान करने के साथ-साथ हमें हिंदी भाषा पर भी जोर देना चाहिए। इतिहास बताता है कि हिन्दी के लिए काफी लम्बा संघर्ष हुआ है। लेकिन हिन्दी का विरोध भी जमकर हुआ। इन सबके बीच हिन्दी का विस्तार कम नहीं हुआ। भारत की राजभाषा हिन्दी दुनिया में दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। बहुभाषी भारत के हिन्दी भाषी राज्यों की आबादी 46 करोड़ से अधिक है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की 1.2 अरब आबादी में से 41.03 फीसदी की मातृभाषा हिन्दी है। हिन्दी को दूसरी भाषा के तौर पर इस्तेमाल करने वाले अन्य भारतीयों को मिला दिया जाए तो देश के लगभग 75 प्रतिशत लोग हिन्दी बोल सकते हैं। भारत के इन 75 प्रतिशत हिन्दी भाषियों सहित पूरी दुनिया में तकरीबन 80 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो इसे बोल या समझ सकते हैं। जब हमारे नेता हिन्दी मे भाषण देते है तो हमे एक फक्र की अनुभूति होती है। डॉ. शुक्ला ने कहा हमें भारत के नागरिकों के रूप में अपनी मातृभाषा – हिंदी को अन्य भाषाओं और दुनिया के अन्य देशों में मान्यता के महत्व को प्राप्त करने पर ध्यान देना चाहिए। इस प्रामाणिक भाषा के अस्तित्व का आकलन करने के कारण हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवसों के रूप में मनाया जाता है। मेरे विचार के अनुसार प्रत्येक विद्यालय, महाविद्यालय और संगठन को इस दिन हमारी हिंदी भाषा को समर्पित विशेष प्रतियोगिताओं के द्वारा मनाना चाहिए। कविता लेखन और कविता सुनाना, कथालेखन और कथा सुनाना, निबंध लेखन और हिंदी शब्दावली की प्रश्न उत्तर आदि के विभिन्न सत्रों को व्यवस्थित किया जा सकता है ताकि अन्य लोगों के साथ युवा पीढ़ी हिंदी भाषा से ज्यादा जुड़ी हो।

देश का दूसरे देशों से बढ़ रहा व्यापार
हिंदी विभाग की डॉ. शीला त्रिपाठी ने कहा कि भारत के अलावा इसे नेपाल, मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम, यूगांडा, दक्षिण अफ्रीका, कैरिबियन देशों, ट्रिनिडाड एवं टोबेगो और कनाडा आदि में बोलने वालों की अच्छी-खासी संख्या है। इसके अलावा इंग्लैंड, अमेरिका, मध्य एशिया में भी इसे बोलने और समझने वाले लोग हैं। इसे देखते हुए हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए सरकार की ओर से प्रयास किए जा रहे हैं। वैसे यूनेस्को की सात भाषाओं में हिन्दी पहले से ही शामिल है। वैश्वीकरण और भारत के बढ़ते रूतबे के साथ पिछले कुछ सालों में हिन्दी के प्रति विश्व के लोगों की रूचि खासी बढ़ी है। देश का दूसरे देशों के साथ बढ़ता व्यापार भी इसका एक कारण है।

हिंदी ने दी राष्ट्र को अनूठी पहचान
भारतीय संविधान ने अंग्रेजी को हिंदी के साथ-साथ अपने देश की आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया। स्वतंत्रता के दो साल बाद नवगठित प्रशासन राष्ट्र के कई सांस्कृतिक भाषाई और कई धार्मिक समूहों को एकजुट करने के लिए सामाजिक दबाव में था। यह भी महत्वपूर्ण था कि पूरे देश को एक साथ रखने में अद्वितीय राष्ट्रीय एकता को बनाए रखा गया। भारत में ऐसी कोई भी भाषा नहीं थी जो इसे एक अनूठी राष्ट्रीय पहचान दे सकती थी। इसलिए एकीकरण के समाधान के रूप में हिंदी को स्वीकार किया गया। इससे भी ज्यादा यह उत्तर भारत के प्रमुख हिस्सों में बोली जाती है। यह राष्ट्रीय भाषाई एकीकरण के लिए एक स्पष्ट संकल्प था। हिंदी भारतीय एकता का प्रतिनिधित्व है और हमारी राष्ट्रीय भाषा भी है। यह देखना बहुत उत्साहजनक है कि किस तरह बच्चों ने बहुत उत्साह के साथ भाग लिया है और इसके लिए उनके माता-पिता को भी श्रेय देना ज़रूरी है जो शिक्षकों के साथ-साथ अपने बच्चों में इस संस्कृति का जिक्र करते हैं। इस अवसर पर महाविद्यालय की छात्राओं प्रतिमा निषाद,वंदना निषाद,शशि यादव, हर्षिता शर्मा ने भाषण प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में उप प्राचार्या डॉ. प्रियंका त्रिपाठी सहित अन्य लोग मौजूद रहे।

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